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इलैक्ट्रो होम्योपैथिक
पैरासेल्सस के प्रथम सिद्धान्त ‘ सम से सम की चिकित्सा ’ पर डॉ0 हैनिमैन सहाब ने होम्योपैथिक चिकित्सा
का आविष्कार किया, वही उनकी मृत्यु पश्चात पैरासेल्सस के दूसरे सिद्धान्त ‘ वनस्पति जगत में विद्युत शक्ति विद्यमान ’ होती है
। इस सिद्धान्त पर इलैक्ट्रो होम्योपैथिक
का आविष्कार बोलग्ना इटली निवासी डॉ0 काऊट सीजर मैटी ने 1865 ई0 किया था । इस
चिकित्सा पद्धति की औषधियों में प्रयुक्त 114 वनस्पतियों का प्रयोग कर डॉ0 मैटी
ने 38 मूल औषधियों का निर्माण किया था , रस रक्ते च शुद्धे प्राणी दीर्धायुराप्नोति
अर्थात रक्त व रस के शुद्ध होने एंव इसकी समानता से व्यक्ति निरोगी व दीर्ध जीवी
होता है, इस सिद्धान्त पर उन्होने अपनी चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया उनका
मानना था कि शरीर में उपस्थित रस एंव रक्त
शरीर को होम्योस्टेटिस प्रक्रिया व्दारा शुद्ध व साम्यावस्था में बनाये रखकर
व्याधियों को दूर किया जा सकता है । डॉ0 मैटी सहाब ने प्रारम्भ में मूल 38
औषधियों का निर्माण किया तथा उन्ही 38 दवाओं को आपस में शारीरिक रोग एंव शरीर के
आंतरिक अव्यवों तथा रोग प्रकृति के अनुसार आपस में मिश्रित कर कुल 60 दवाओं का
निर्माण किया जो आज प्रचलन में है तथा कुछ विद्वान चिकित्सकों ने इन्ही मूल
औषधियों को रोग स्थिति के अनुसार आपस में मिश्रित कर कुछ और नई औषधियों का निर्माण
किया है जिससे इनकी संख्या में वृद्धि हुई है ।
इलैक्ट्रो होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के दो
सिद्धान्त है 1
1-वनस्पति
जगत में वि़द्धुत शक्ति विधमान होती है
2- रस और
रक्त की समानता एंव शुद्धता
मैटी
सहाब ने हानिरहित वनस्पतियों की वि़द्धुत शक्ति की खोज करते हुऐ 114 वनस्पतियों
के अर्क को कोहेबेशन प्रक्रिया से निकाल कर 38 मूल औषधियों का निर्माण किया था, जो मनुष्य के रस एंव रक्त के दोषों को दूर कर उन्हे शुद्ध व
सम्यावस्था कर रोग मुक्त करती है , उन्होनें उक्त औषधियों के निर्माण में
शरीर के अंतरिक अंगों पर कार्य करने वाली औषधियों के समूह का निर्माण किया जिन्हे
आपस में मिला कर मिश्रित कम्पाऊंउ दवा बनाई गई इस प्रकार इनकी संख्या बढकर कुल
60 हो गयी है ।
इसे
सुविधा व कार्यो की दृष्टि से निम्न समूहों में विभाजित किया जा सकता है । इस
विभाजन में मूल औषधियों के साथ मिश्रित किये गये कम्पाऊड की संख्या भी सम्मलित
है ।
1- स्क्रोफोलोसोज :- यह प्रथम वर्ग की औषधी है जो रस पर कार्य
करती है एंव मेटाबोलिज्म के कार्यो को संतुलित एंव उसके कार्यो को सामान्य रूप से
संचालित करने वाली एक क्रियात्मक औषधिय है जो रस तथा पाचन सम्बन्धित अव्यावों पर कार्य करने वाली औषधीयों को इस
प्रथम वर्ग में रखा जो स्क्रोफोलोसोज या
अपने नाम के प्रथम सम्बोधन अक्क्षर जानी जाती है मूल औषधी सख्या में 9 है जो इस
प्रकार है S-1,S-2, S-3,S-4, S-5,S-6, S-10,S-11,
S-12, SLass बीच की
जो संख्या छुटी है वह मिश्रित दवायें है जो आपस में मूल दवाओं को मिश्रित कर बनाई
गई है ।
2-
स्क्रोफोलोसोज-1
:- S-1 यह दवा हमारे रस से सम्बधित समस्त प्रकार के
रोगों पर कार्य करती है इसलिये यह हमारे शरीर के मेटाबोल्जिम एंव पाचन संस्थान पर
कार्य करती एंव उसमें आई समस्त प्रकार की बीमारीयों को ठीक करती है यह इस प्रथम
समूह की प्रथम दवा है एंव यह हमारे शरीर के रस या लिम्फ से उत्पन्न समस्त
प्रकार की बीमारीयों में कार्य करती है एंव यह दवा शक्तिवर्द्धक भूंख बढाने वाली व
पाचन दोषों पर उपयोगी है ।
3-स्क्रोफोलोसोज-2:- S-2 इस औषधी
का सर्वप्रथम प्रभाव मूत्राश्य पर तत्पश्चात किडनी पर एंव गाल ब्लेडर होता है
। ग्रंथियों एंव शरीर के थैली नुमा अवयवों पर कार्य करने वाली दवा है, मूत्राश्य से जुडे समस्त प्रकार के रोगों पर उपयोगी है जैसे मूत्राश्य
तथा गालब्लेडर की पथरी में , मूत्र का
बार बार होना , मधुमेह , पेशाब में जलन , पेशाब का रूक रूक कर होना, स्त्री
पुरूष से जुडे हुऐ जननेद्रिय रोग, स्पर्म
काउन्ट का कम होना, मुत्राश्य एंव पित्ताश्य की पथरी को यह गला कर
निकाल देती है । यह स्त्रीयों तथा पुरूषों के हार्मोन्स समस्याओं को बेलेंस
करती है । हाईड्रोसिल पोतो में पानी के भर जाने पर , जीर्ण प्रकार के सूजाक
(गनोरिया) यह दवा मूत्र को साफ करती है, मूत्र
मार्ग की सूजन को ठीक करती है । यदि मूत्र के साथ रक्त स्त्राव हो रहा हो तो बी
ई के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये ,
स्क्रोफोलोसोज-5:- S-5 लीवर की महौषधी है । इस औषधी का मुख्य कार्य लीवर एंव उसके टिश्यूस पर होता है , लीवर की वजह से गाल ब्लेडर का सिकरेशन कम या अधिक होने के कारण बाईल का निर्माण् न हो रहा हो जो हमारे भोजन को डाईजेस्ट करती है यह दवा गालब्लेडर के सिकरेशन व उसके प्रोडेक्शन को ठीक करती है । लीवर की खराबी की वजह से टाक्सीन (दूषित तत्वों) के जमा होने से शरीर में जो गांठे, फोडे , गैगरीन आदि होते है उसमें उपयोगी है , इसके अतरिक्त लीवर का फैटी या बढ जाना , लीवर सोसाईसिस, आदि में इसका उपयोग किया जाता है । यह दवा एन्टीआक्सीडेन्ट है , ग्रंथ्रियों में प्रभावी होने से गिल्टीयों की सूजन से उत्पन्न होने वाले रोगों में , क्षय रोग को ठीक करने वाली एंव पोषण करने वाली दवा है , यह शरीर से यूरिक ऐसिड को निकालती है इस लिये इसका उपयोग जोडों के दर्दो व गठिया आदि में किया जाता है, इसका प्रभाव जोडो, संधियों एंव रीड की हड्डीयों पर होने से इससे उत्पन्न होने वाले समस्त प्रकार की बीमारीयों में इस दवा का प्रयोग किया जाता है । लीवर की जीर्ण अवस्था में, साईटिका के रोग में चूंकि इस दवा का प्रभाव पाचन तंत्र पर होने के कारण भूख का न लगना, हाईपर ऐसिडिटी, अपच, पेट में गैस बनना, उल्टी, कै, दस्त, कब्ज या पाचन से सम्बन्धि रोगों में यह दवा गाल ब्लेडर की पथरी को गला देती है , यह पथरी कही भी हो चाहे वह किडनी में हो या मूत्राश्य में हो उसे गला कर निकाल देती है ।त्वचा में एक्जीमा, सोराईसिस, ल्युकेाडर्मा, आर्टिकेरिया, आदि में इसका प्रयोग किया जाता है । यह दवा त्वचा को चिकना, मुलायम बनाती है, त्वचा रोग व त्वचा दोषों को दूर करने वाली दवा है, यह जीर्ण त्वचा रोगों की रामबाड औषधिय है । ऐडियों का फटना, धॉवो, गैगरीन, जिद्दी किस्म के धॉवों, त्वचा का बदरंगा होना, यह दवा धॉवों को भरने वाली एंव वहॉ की मॉस एंव त्वचा को चिकना करने वाली है ,
स्क्रोफोलोसोज-6:- S-6 (स्क्रोफोलोसोस-6) किडनी
की समस्याओं के लिये सर्वोतम दवा है , जैसाकि हम सभी इस बात को अच्छी तरह से जानते है कि किडनी हमारे
रक्त को साफ अर्थात रक्त का फिल्टरेशन का कार्य करती रहती है । हमारे शरीर में
विषाक्त या दूषित पदार्थ जिसे हम विजातीय पदार्थ भी कहते है, जो हमारे शरीर में चाहे वह भोज्य पदार्थो के माध्यम से हो या अन्य
किसी भी कारण से जब रक्त में मिल कर शुद्धीकरण हेतु हमारी किडनी में जाती है
किडनी का कार्य है इन विजातीय पदार्थो को रक्त से अलग कर उसे मूत्र मार्ग व्दारा
शरीर से बाहर करना होता है, यह कार्य निरंतर चलता
रहता है । परन्तु जब कभी किडनी में आई खराबी के कारण रक्त से विषाक्त पदार्थ
बाहर नही निकल पाते ऐसी स्थिति में रक्त दूषित हो जाता है एंव जिससे रक्त के कम्पोजिशन
में खराबी आने लगती है , यह किडनी के ठीक से कार्य
न करने के कारण उसकी संरचना में भौतिक परिवर्तन की वजह से होती है । रक्त को छानने वाले नेफरान में सूजन की वजह से
रक्त का फिल्टरेशन नही होने के कारण एल्बूमिन, क्रेटिनिन, कोलिस्ट्रिाल , खनिज तत्व एंव यूरिक ऐसिड की मात्रा बढ जाती है, खनिज तत्व , एंव यूरिक ऐसिड की मात्रा
के बढने से जोडों , व मॉस पेशियों में सूजन व र्दद होता है ,इसके प्रभाव से हिद्रय जो शरीर में रक्त संचार का कार्य करता है
उसके कार्यो में भी अनावश्यक परेशानीयॉ होने लगती है । इसी खनीज तत्वों के जमाव के कारण किडनी में पथरी बनने लगती है । अत:
यह दवा किडनी रोगों की प्रमुख दवा है, जो किडनी को उत्तेजित कर
उसके कार्यो को सामान्य अवस्था मे लाने का कार्य करती है । किडनी के बाद इस दवा
का कार्य मूत्राश्य पर होता है । जबकि एस-2 का प्रभाव पहले मूत्राश्य पर होता है
इसके बाद किडनी पर होता है । शरीर में जमा यूरिक ऐसिड को एस-5 तथा एल ग्रुप की
दवाओं के साथ देने से यूरिक ऐसिड पेशाब के माध्यम से निकलती है जिसके तलछट का रंग
लाल होता है , यूरिक ऐसिड के निकल जाने
के बाद शरीर में खनिज तत्व का शेष भाग जमा रहता है जिसे एस-6 की सहायता से निकाला
जा सकता है , ऐसी स्थिति में पहले
एस-5 एंव एल ग्रुप की दवाओं को देकर यूरिक ऐसिड को निकाल देना चाहिये, इसके बाद शरीर में जमे खनिज तत्वों को निकालने के लिये एस-6 का
प्रयोग करना चाहिये यह दवा शरीर में जमे खनिज तत्वों को गलाकर निकाल देती है । यह
दवा एस-1 एस-2 और एस-5 की पूरक दवा है । इस दवा का प्रभाव किडनी, मूत्राश्य संस्थान एंव उसकी पेशियों एंव हड्डीयों को जोडने वाले
सूत्रों पर भी है
रक्त से अशुद्ध या विषाक्त पदार्थो के शरीर से न निकलने के कारण शरीर के जोडों में व अन्य सूत्रों में यूरिक ऐसिड एंव खनिज तत्व जमा होने लगता है जिससे जोडों में सूजन व र्दद होता है, जिसे गठिया, संधिवात, के मांस पेशियों में र्दद व सूजन होने लगती है यही खनिज तत्व जब किडनी एंव मूत्राश्य में जमा होने लगती है तो पथरी बनने लगती है । रक्त संचार का उचित तरीके से न पहुचने के कारण मांसपेशियों में दुर्बलता आ जाती है जिसकी वजह से हाथ पैरों में कम्पन्न होने लगता है, एस-6 किडनी की पथरी की विशेष दवा है जबकि एस-2 मुत्राश्य की पथरी की दवा है पुराने रोगों में पथरी बनने से रोकने के लिये एस-2 का प्रयोग किया जाता है चाहे वह पथरी किडनी में हो या मूत्राश्य में । एस-6 पथरी को घोल कर मूत्र मार्ग से बाहर निकाल देती है पथरी को गलाने व निकालने में इसके साथ इसकी सहायक औषधियों का भी प्रयोग करना चाहिये । इस दवा का प्रभाव स्त्री पुरूषों के जननेन्द्रियों पर भी है अत: स्वप्नदोष, नंपुसकता, और शुक्रक्षय ,तथा गर्भाश्य के रोग व रक्त स्त्रावों में इसका प्रयोग पूरक एंव सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये । जैसे गर्भाश्य के स्त्रावों पर सी-1 रक्त स्त्रावों पर बी ई के साथ प्रयोग करना चाहिये, पुरूषों के रोग में इसे वेन, एंव आर ई के साथ प्रयोग करना चाहिये । पेशाब में जलन, रूक रूक कर आना, यू0टी0आई0 की समस्यायें, बच्चों का बिस्तर में पेशाब कर देना ,बहुमूत्र, मूत्र में शक्कर आने पर अपनी सहायक औषधियों के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये, जैसे सी-17, पेशाब रूकने पर इसकी तीब्र मात्रा अर्थात डायल्युशन 1 एंव 2 का प्रयोग जल्दी जल्दी करना चाहिये,जब तक कि पेशाब चालू न हो जाये । बार बार पेशाब होने पर इसके उच्च से उच्चतम डायल्यूशन जैस डी 6 - 10 या फिर रोग स्थिति के अनुसार और भी उचे डायल्युशन का प्रयोग किया जा सकता है । पेशाब की नशों का फूलना या सूजल ,
इस औषधिय का प्राकृतिक
गुण पथरी नाशक ,कठमाला नाशक , रक्त शोधक , प्रदाह नाशक ,जबानी में सूखा रोग, पेशाब का रूकना एंव पेशाब
का अधिक होना, मूत्राश्य , किडनी के कार्यो को सुचारू करती है ।
स्क्रोफोलोसोज-10:- S-10 इसे स्क्रोफोलोसोस जियापुन भी कहते है यह दवा नर्वस सिस्टम सिम्फाईटिक नर्व पर कार्य करती है, इसलिये पागलपन, हिस्टीरिया, मिर्गी, वातज पीडा, मस्तिष्क के रोग, सिर र्दद, आधा शीशी का र्दद आदि रोगों में प्रयोग की जाती है ।इस औषधिय का प्रभाव श्वसन तंत्र के वातज सूत्रों पर होने से खॉसी, जुखाम, कफ जनित रोगों, बदबूदा सडा हुआ कफ निकलना, दमा रोग, एंव पुरानी से पुरानी खॉसी में पी ग्रुप की औषधियों के साथ में प्रयोग की जाती है ,निमोनिया, टांसिल, गले के रोग, नये पुराने जुखाम में, छींके आना, गले में र्दद, गले के सभी तरह के श्वसनतंत्र के रोगों में अपनी पूरक औषधियों के साथ प्रयोग की जाती है । त्वचा सूत्रों पर प्रभावी होने के कारण यह त्वचा रोगों में, ल्युकोडर्मा, फोडा आदि में, अपनी सहायक औषधियों के साथ प्रयोग की जाती है , त्वचा में पसीना रूक गया हो तो इसके प्रयोग से पसीना आने लगता है, जब कभी बुखार की स्थिति में जब शरीर से पसीना न निकलता हो एंव रोगी का बुखार न उतर रहा हो तो इसके प्रयोग से पसीना आने लगता है एंव शरीर का तापक्रम धीरे धीरे कम होने लगता है इसके साथ बुखार में प्रयोग की जाने वाली अन्य औषधियों का भी प्रयोग किया जा सकता है जैसे एफ ग्रुप वाई0 ई0 वर ग्रुप जैसे औषधियॉ जो रोग स्थिति पर निर्भर करती है, बुखार किसी भी प्रकार का हो खसरा, चेचक, वायरल फीवर, या हैजा , मलेरिया , सामान्य बुखार, किसी बीमारी की स्थिति में होने वाला बुखार आदि में इसका प्रयोग अपनी सहायक, एंव पूरक औषधियों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । इस औषधिय का विशेष प्रभाव डाईजेटिव सिस्टम, सोरल फैलेक्सेस या अमाश्य के पाचन अंगों के वात सूत्रों पर होने से यह पाचन से सम्बधित समस्त प्रकार के रोग जैसे भोजन का न पचना, भूंख न लगना , दस्त लगना, पुराने से पुराना दस्त , पेचित, खूनी ऑव, छाती में जलन , खट्ठी डकारे आना, बिना पचा भोजन का दस्तों के माध्यम से निकल जाना, उल्टी, अजीर्ण,पेट में गैस का बनाना आदि में इसका प्रयोग अपनी अन्य सहायक औषधियों के साथ किया जाता है, यह औषधी आंतों को सक्क्षम एंव बलवान बनाती है, यह पाचन रस डायजेस्टिव जूस का निर्माण करती है । एस-1 लसिका वाहनी एंव कफज अवयवों की दवा है , परन्तु एस-10 वात सूत्र तथा उसके समूह की दवा है । यह दवा रक्त को शुद्ध करती है एंव शारीरिक शक्ति को बनाये रखती है । अत: हम कह सकते है कि यह औषधी पाचन से सम्बधित समस्त रोगों में अच्छा कार्य करती है । पाचन तंत्र से सम्बधित कुछ बीमारीयॉ ऐसी भी होती है जिसमें कभी कभी रोगी को कब्ज रहना कभी पानी की तरह से दस्त होना, पेट में र्दद रहना आदि में अपनी सहायक एंव पूरक औषधियों के साथ प्रयोग करने से अच्छे परिणाम मिलते है जैसे कब्ज में एस लास, वाई0ई0 के साथ प्रयोग करने पर आशातीत परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । पेट र्दद में एस-10 के साथ डब्लू0ई0 का प्रयोग करने से अच्छे रिजल्ट मिलते है । यह दवा समस्त प्रकार के महामारीयों से सुरक्षित रखती है ,जापान में जब हैजा फैला था उस समय इसने बहुतों को उक्त महामारी से सुरक्षित रखा था, इसी लिये इस दवा का नाम स्क्रोफोलोसो जियापुन पडा । यह दवा एन्टीबैक्टेरिया प्रोपरिटी होने के कारण यह किसी भी प्रकार के रोगजन्य बैक्टेरिया को खत्म कर देती है रोगजन्य बैक्टेरिया चाहे शरीर के अंतरिक अंगों में हो या फिर रक्त में यह सभी प्रकार के बैक्टेरिया को शरीर से बाहर निकाल देती है । यह दवा एन्टी आक्सीडेन्ट भी है , एव यह दवा हैजा,प्लेग, कैंसर विशूचिका, जैसी महामारी से सुरक्षित रखती है ।
स्क्रोफोलोसोस-11:- S11 का विशेष प्रभाव वेगस नर्व के साथ अमाश्य, गले की नर्व ,स्पाईनल नर्व, सैरीब्ररल, पिट्टूरी ग्लैड, इसोफईगस, पर है । यह दवा हर प्रकार की उल्टी में प्रयोग की जाती है जैसे कुछ
लोगों को यात्रा करते समय उल्टीयॉ आती है या किसी किसी को झूले में बैठने से उल्टीयॉ
होने लगती है , कहने का अर्थ है यह दवा सभी
किस्म की उल्टीयों में प्रयोग की जाती है जैसे सूखी या उल्टी की इक्च्छा होना
परन्तु उल्टी न हो या गर्भावस्था की उल्टी , उल्टी के गंध से उल्टी होना ,अतरिक्त इसका प्रयोग स्क्रबी रोग में भी होता है यह दवा स्क्रबी
रोग की महाऔषधी है,स्क्रबी रोग विटामिन सी की
कमी से होता है, यह दवा विटामिन सी की कमी को पूरा करती है एंव विटामिन सी की वजह से
जो भी रोग हो उसमें इसका प्रयोग किया जाता है । मुंह के रोग जैसे मसूढों से खून
आना मसूढों में सूजन यह दवा मुंह के धॉवों को भरती है मुंह में किसी भी तरह की
इंजूरी होने पर , हर्मोनल इनबैलेंस में , चक्कर आना, तंत्रिका तंत्र से जुडी समस्याओं पर, फोडे ऐसे धॉव जो न भर रहे
हो, किसी भी प्रकार के नशे की आदत को छूडाने में या नशे के कारण जो भी
बीमारीयॉ हो उसमें इसका प्रयोग करना चाहिये । यह दवा टॉक्सीसिटी को कम करती है ऑख
कान गला गुदा मार्ग से रिसाव , विटामिन सी की कमी से बालों की समस्या या लाल रक्त कणिकाओं की कमी , दिमाकी समस्याये, जैसे रात में नीद न आना, माथे पर बोझ सा महशूस होना, माईग्रेन, याददास्त का कमजोर होना, मिर्गी रोग में भी इसका
प्रयोग अन्य सहायक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
यह दवा अपनी सहायक औषधियों के साथ लीवर एंव किडनी पर भी अच्छा कार्य करती है । इस
दवा का प्रभाव भोजन नली, मूत्राश्य, गर्भाश्य ,पर भी है ।
स्क्रोफोलोसोस-12 या (मैरीना या मार) S12:- यह दवा ऑखों की सभी प्रकार की समस्याओं के लिये उपयोग की जाती है । इसका प्रभाव ऑखों की ऑप्टिकल नर्व, रैटिना, कार्निया लैंस, पर है , दवा का जैसे ऑखों से पानी आना, आई फ्लु, मोतियाबिन्द, ल्युकोमा, ऑखों में लालीमा, सूजन, आखों से ऑसू आना या ऑखों का सूख जाना , ऑखों के जख्म, ऑखों पर फोडा फुंसी, ऑखों की खाल का गलना, ऑखों की रोशनी का कम होना ,ऑखों का लकवा, ऑखों की पलकों का न झपकना , यह दवा रक्त स्त्रावों की भी अच्छी दवा है रक्त स्त्राव शरीर के किसी भी स्थान से हो रहा हो इसका उपयोग किया जा सकता है । यह दवा भी विटामिन सी का अच्छा स्त्रोत है । ऑखों की जितनी भी नस नाडीयॉ है उस पर भी इस दवा का अच्छा प्रभाव होता है, ऑखों के संक्रामण रोगों की अवस्था में, एंव जब कभी ऑखों के संक्रामण रोग की बीमारी चल रही हो तो इस दवा को सुरक्षा की दृष्टी से बचाव हेतु उपयोग किया जा सकता है । इसका प्रयोग ऑखों को सुरक्षित रखने हेतु भी किया जा सकता है । इसके प्रयोग से ऑखों की रोशनी बढती है एंव ऑखों के रोगों से सुरक्षा मिलती है अत: इसका उपयोग स्वस्थ्य व्यक्ति भी कर सकते है ।
स्क्रोफोलोसो लैसेटिवो- या (एस लॉस) SLass:-एस लॉस का प्रभाव आंतों एंव उनके स्नायुओं पर, होने से यह पाचन सम्बधित व्याधियॉ जैसे पेट में गैस बनना , एसिडिटी , खट्टी डकारे आना , बार बार मल त्याग की इक्च्छा कभी सक्त मल तो कभी पतले पतले दस्तों का होना , पेट साफ न होना अर्थात कब्ज होना । कब्ज के अधिक दिनों तक बने रहने एंव स्टूल का कडा व सक्त होने से मलव्दार छिल जाता है, या फिर सक्त मल के होने से जो प्रेशर लगाते है उसका प्रभाव हमारे रक्त केशिकाओं एंव छोटे छोटे वेंस की नलिकाओं पर होता है इससे उस स्थान के वेंस में सूजन व गांठे होने लगती है जो बाद में बबासीर या भगंदर के रूप में परणित हो जाती है । इसलिये इस दवा का उपयोग कब्ज नाशक के रूप में अपनी अन्य सहायक औषधियों के साथ किया जा सकता है जैसे एस-2, बर्र-1, वाई ई, । कब्ज होने से जो भी समस्याये आती है उनमें अपच, गैस बनाना , खट्ठी डकार, भूंख न लगना , अपच व कब्ज की वजह से सिर र्दद, चक्कर आना, नीद न आना , चिढचिढापन, माईग्रेन, तथा आगे चलकर ये तंत्रिका तंत्र से सम्बधित रोग होने लगते है । एस लॉस के देने से भॅूख लगने लगती है पाचन क्रिया में सुधार व कब्ज ठीक होने लगता है । इस दवा का प्रभाव तत्काल न होकर धीमा होता है परन्तु परिणाम निश्चत है ।
एंजियाटिको-1 दवा का प्रभाव रक्त धमनियों ,एंव महाधमनी पर है , धमनियों में शुद्ध रक्त बहता है तथा शरीर की समस्त धमनियों उनकी कोशिकाओं एंव तन्तुओं पर प्रभाव रखने के कारण छोटी छोटी कोशिकाओ एंव तन्तुओं तक रक्त पूर्ति करती है, इससे कोशिकाओं को उनका भोजन तथा आक्सीजन की सप्लाई नियमति बनी रहती है, एंव कोशिकाओं को उर्जा मिलती रहती है पुरानी कोशिकाऐ नष्ट होती रहती है तथा नई कोशिकाये बनती रहती है । एंजियाटिको -1 जहॉ कही रक्त संचालन में आई रूकावट की वजह से उक्त अंगों तक रक्त सप्लाई नही हो पाती वहॉ के सेल्स तथा टिशू डेमेज होने लगते है वहॉ पर विजातीय तत्वों के जमा होने से वहॉ पर गाठों का निमार्ण होने लगता है, उक्त स्थानो पर सूजन आ जाती है । छोटी छोटी कोशिकाओं तक रक्त की पूर्ति न होने से उक्त स्थान के सेल्स को भोजन व आक्शीजन के न मिलने से सेल्स तेजी से नष्ट होने लगते है, सेल्स के नष्ट होने से उस स्थान या सम्बन्धित अंग पर मृत सेल्स जिसका शरीर से बाहर निकल जाना अति आवश्यक है अन्यथा मृत कोशिकाऐ जो शरीर के लिये फारेन बाडी (विजातीय तत्व) है यदि वह शरीर से बाहर नही निकल पाती तो उस स्थान में सूजन गाठे फोडा जो आगे चल कर कैंसर जैसी घातक बीमारी बन सकती है यह सभी ब्लड सकूलेशन की वजह से होता है । ब्लड सरकूलेशन की वहज से शरीर का कोई भी अंग ठीक से कार्य न कर रहा हो, हाथ पैर ठंडे पड जाते हो, रक्त की कमी हो , आदि समस्याओं पर इस दवा का प्रयोग करना चाहिये । जब कोई ब्लाकेज आ जाती है तो हिद्रय को अधिक कार्य करना पडता है यह दवा ब्लड र्सकुलेशन में अच्छा कार्य करती है । सभी प्रकार की बीमारीयॉ लगभग ब्लड या लिम्फ में आई खराबी की बजह से होती है ।
ब्लड के कम्पोजिशन में आई खराबी की वजह से यूरिया, कैटीनिन, कोलेस्टाल आदि बनने पर यह दवा अच्छा कार्य करती । ब्लड प्रेसर का लो या हाई होने पर भी यह दवा अच्छा कार्य करती है परन्तु इस स्थिति में इसका प्रयोग डायलूशन के प्रयोग पर निर्भर करता है , जैसे लो ब्लड प्रेशर मे ए-1 की सूखी गोलियों का प्रयोग करना चाहिये । ब्लड र्सकुलेशन का उचित तरीके से कार्य न करने पर शरीर के कई प्रमुख अंग जैसे लीवर, स्प्लीन ,पेनक्रियाज, किडनी, ऑते, ब्रेन ,हिद्रय आदि प्रभावित होते है । एंजियाटिको -1 रक्त को शुद्ध करते हुऐ रक्त संचार को ठीक करती है , यह दवा त्वचा रोगो में भी अपनी सहायक औषधियों के साथ अच्छा कार्य करती है ,साथ ही किसी भी तरह की सूजन के लिये बहुत ही उपयोगी दवा है । रक्त संचार ठीक से कार्य न करने के कारण जो भी रोग उत्पन्न होते है उसमें यह दवा उपयोगी है । शरीर के किसी भी स्थान से रक्त स्त्रावों का होना जैसे नकसीर , बबासीर या फिर महिलाओं के माहवारी के समय होने वाले रक्त स्त्राव में यह दवा अपनी सहायक औषधियों के साथ अच्छा कार्य करती है । ब्लड सकुलेशन की बजह से खूनी या बादी बबासीर आदि में खूनी बबासीर में बी ई के साथ देना चाहिये । चिडचिडापन ,पागलपन ,मिर्गी, आधेधड का लकवा, तथा मानसिक रोग, दिमाकी परेशानीयॉ, माईग्रेन, आदि में यह दवा अपनी सहायक औषधियों के साथ अच्छा कार्य करती है । किडनी, मूत्र वाहक संस्थानों में रक्त कम पहुंचने के कारण जो रोग होते है उसको यह ठीक करती है । इसका कार्य उन अंगों पर भी है जो रक्त शुद्धि सम्बंधी कार्य करते है जैसे लंग ,लीवर आदि रक्त संचालन का ठीक से कार्य न करने के कारण शरीर के कई आंतरिक अंगो में प्रदाह होने लगता है जैसे हिद्रय, फेफडे, यकृत, मूत्राश्य, मूत्रनली, तथा तालू की ग्रथियों में सूजन रक्तस्त्रावों के होने पर महिलाओं की बीमारी जैसे माहवारी का अधिक होना या कम होना इस पीरियड में कमर या पेट मे र्दद कमजोरी तबियत खराब होने काला रक्त, गाठे नुमा रक्त गाढा खून जैसी स्थिति में ए-1 दवा को इसकी सहायक औषधि सी-1 के साथ प्रयोग करना चाहिये अधिक रक्त स्त्राव होने पर इसके साथ बी ई का भी प्रयोग करना चाहिये । इतना ही नही यह दवा रक्त की कमी को दूर करती, तथा यह हिद्रय को मजबूत बनाती है इसे हिद्रय का टॉनिक भी कह सकते है, हार्ड टॉनिक के रूप में इसका सेकेन्ड डायलूशन का प्रयोग करना चाहिये । यह रक्त शोधक अर्थात रक्त को शुद्ध करने बाली दवा है, हिद्रय निर्बलता में उपयोगी दवा है ।दमा जिसमें रक्त संचय हो इस दवा का प्रयोग पी ग्रुप की दवा के साथ करने से बहुत अच्छे परिणाम मिलते है । यह सभी तरह के बुखर चिकिनगुनिया , पुराना बुखार ,टाईफाईड, बायरल फीवर, किसी भी तरह के बुखार में ए-1 को एफ-1 के साथ प्रयोग करने पर आशातीत प्ररिणाम मिलते है ।
एंजियाटिकोज -2:- A-2 वेन पर कार्य करती है वेन में अशुद्ध रक्त बहता है । अत: वेन में आई किसी भी तरह के अवरोध को यह दवा ठीक करती है बेनस में आये अवरोध जैसे वेन के दब जाने या वहॉ पर रक्त संचार के ठीक से न होने के कारण बेरीकोज वेन डिसीज ,या वेनस में ब्लड सर्कुलेशन के ठीक से न होने के कारण गाठों ,मस्से ,या टयूमर आदि का बनान या साईटिका या उसका र्दद ,वेनस में रक्त के जमने से उस अंग को रक्त की पूर्ति उचित तरीके से नही हो पाती इससे उस जगह की कोशिकाओं एंव टिश्यू को उनका भोजन तथा आक्सीजन की पूर्ति नही हो पाती इससे उस अंग पर रक्त का जमाव होन लगता है कोशिकाओं व टिश्यू के मरने से वहा पर गाठे बनने लगती है जो आगे चलकर टयूमर , मलद्वार के बेनस में रक्त के जमने के कारण धीरे धीरे गाठे बनने लगती है जो बादी या खूनी बबासीर की बीमारी का कारण होती है । यदि वेन्स में रक्त संचार उचित रूप से होता रहेगा तो शरीर में अशुद्ध रक्त का जमाव नही होगा इससे गाठे , मस्से ,मुंहासे, सिस्ट टयूमर आदि के बनने की संभावना नही होगी । यदि शरीर के बॉये भाग में लकवा लगा हो तो इस दवा का प्रयोग अवश्य करना चाहिये । शरीर में ब्लड सर्कुलेशन की खराबी की वजह से शरीर में कही भी पानी भरने की स्थिति में भी इसका प्रयोग करना चाहिये । किसी भी तरह की रूकावट ,मोच ,सूजन मॉस पेशियों में र्दद ,जोडों में र्दद आदि पर ए-2 के प्रयोग को कदापी नही भूलना चाहिये । वेन्स से जुडी किसी भी तरह की समस्याये जैसे बेरीकोज वेन्स , साईटिका,शरीर में शून्यपन ,हार्ड से जुडी किसी भी तरह की समस्याओं पर ए-2 के तीसरे डयलूशन का सफलतापूर्वक प्रयोग किया जा सकता है । लो व हाई ब्लड प्रशर में इसका प्रयोग किया जा सकता परन्तु यह डायलूशन याने दवा की पोटेंशी पर निर्भर करता है । हाई ब्लड प्रेशर में ए-2 के तीसरे या इससे उपर के डयलुशन का प्रयोग किया जा सकता है । लो ब्लड प्रेशर में दूसरे डायलुशन का प्रयोग या तीसरे डायलूशन का प्रयोग करना चाहिये ।
एंजियाटिको -3 यह दवा ब्लड के कार्यो को ठीक करती है ब्लड कम्पोजिशन के बिगड जाने से यदि कोलेस्ट्राल का बढ जाना , आट्री ,एंव बेन्स में कोई भी खराबी होने पर ब्लाकेज का होना , ब्लाकेज को यह दवा धीरे धीरे धोल देती है । ब्लाकेज की बजह से ब्लड प्रशर का बढना या कम होना आदि में इसका प्रयोग किया जाता है ,ब्लड में टॉक्सीन पैदा होना , क्रेटिनिन ,यूरिक एसिड, लिम्फ में कोई खराबी आदि में इसका उपयोग किया जाता है । कुल मिलाकर हम यह कह सकते है कि इस दवा का प्रयोग ब्लड,या ब्लड कम्पोजिशन में आई खराबीकी वहज से जो भी रोग उत्पन्न होते है उसमें इसका प्रयोग करने से आशानुरूप परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । यह दवा ब्लड के कार्यो व उसके कम्पोजिशन को ठीक करती है ब्लड संचार की अनियमितता या ब्लड संचार में उपयोग आने वाले समस्त अंगों उसमे उत्पन्न रोगों आदि पर इस दवा का प्रयोग किया जाता है । यह दवा रक्त को शुद्ध करती है इसलिये असका प्रयोग समस्त प्रकार के त्वचा रोगो पर अपनी सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये , जैसे त्वचा रोग , सोराईसिस, ल्युकोडर्मा आदि में ।
महिलाओं के मासिकर्धम से सम्बन्धित रोगों पर इसका
प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये, जैसे मासिक धर्म का कम होना
या समय पर न होना , या मासिकधर्म का अधिक होना ,मासिक में रक्त स्त्रावों ,रक्त में काले
थक्के का निकलना ,एम सी पीरियड में जो भी समस्या हो
उसमें इसका प्रयोग सी-1 के साथ करना चाहिये ।
4- लिन्फैटिकोज :- तीसरे वर्ग में रक्त एंव रक्त दोनो पर कार्य करने वाली औषधियों को रखा गया जो लिन्फैटिकोज नाम से जानी जाती है इस समूह में एल-1 एक औषधियॉ है ।
लिंफैटिको-1 Linfatico-1(Lymphmittel-1)
यह औषधिय एस और ए वर्ग के बीच की औषधिय, अत: रक्त एंव रस दोनों के कार्यो में आई
खराबी व असमानता को दूर करती है एंव उन्हे अपनी स्वाभाविक अवस्था में लाती है ,अत: हम कह सकते है कि यह रक्त एंव रस को शुद्ध करती है, तथा वात पित एंव कफ की अवस्था
को समान करती है , भोजन पचकर जब रस बन
जाता है तब इस औषधीय का कार्य आरम्भ होता है, रक्त और रस (लिम्फ) हमारे शरीर में निरंतर
प्रभावित होता रहता है । जैसे रक्त या रस के संगठन
उसके कार्यो में या उनकी बनावट, संरचना आदि में कोई खराबी आ जाये या कम अधिक
बनने लगे जिससे शारीरिक क्रियाओं में असमानता आने लगती है और व्यक्ति बीमार होने
लगता है, रस व रक्त का सही होना व
उचित रूप से काम करना हमारे स्वस्थ्य के लिये अति आवश्यक है, प्राय: अधिकाश बीमारीयॉ इन्ही दोनों के
बिगडने से होती है । यह रोग के ठीक होने के बाद शक्तिवद्धक का कार्य करती है । यह
रक्त रस दोनो पर तो कार्य करती ही है परन्तु यह रक्त शोधक भी है ,
5-
हर्मोंस :- लिम्फ की वजह से हर्मोंस का सिकरेशन उचित तरीके से नही होता, इससे हर्मोनलस इन बैलेंस होने लगता है जिसकी वजह
से थाईराईड ग्लैड , प्रभावित होती है हर्मोस का सही तरीके से
कार्य न करने के कारण बच्चों का शारीरिक विकाश नही हो पाता, उनका बजन नही बढता ,लम्बाई नही बढती , बच्चों की इस समस्या के
लिये इस औषधीय के साथ इसकी सहायक औषधियों के प्रयोग जैसे सी-4 एस-1 या अन्य
निर्देशित औषधियों के साथ प्रयोग करने से अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है , हार्मोनल इन बेलेंस की वजह से महिलाओं में
चहरे पर बाल निकलने लगते है । हार्मोस का सही ढंग से कार्य न करने के कारण जो भी
बीमारीयॉ होती है जैसे बच्चें का विकास न मोटापा ,स्त्रीयों या बच्चीयों में स्त्री सुलभ अंगों
का विकास न होना , कई प्रकार की मानसिक अवस्थाये ,या मानसिक
विकिृतियॉ जो हार्मोस की वजह से हो उसमें इसका प्रयोग
अपनी सहायक औषधियों के साथ करने से अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
इस औषधिय का प्रभाव रक्त
के आर बी सी एंव डब्लू बी सी पर होने से अधिकाश रोग इस औषधिय की सीमा में आ जाते
है , इस औषधिय का प्रभाव विशेषरूप से शैल्श्मिक कलॉ
अर्थात म्युकस मैम्बरेन पर होता है ,अत: ग्रन्थी ग्लैन्ड पर होन से यह पुरूषों के नामर्दी रोग में
अपनी सहायक औषधिये वेन और आर ई के साथ प्रयोग की जाती है ।
इस औषधिय का प्राकृतिक
गुण अम्ल नाशक है , इसलिये यह पाचन क्रिया पर अपना प्रभाव रखती है , एंव अमाशय के कायों का उचित कार्य न करने की
वजह से भोजन का ठीक से न पचना, अपच , खटटी डकारे, आदि में अपनी सहायक औषधियों के साथ उपयोगी है, चूंकि हमारा लीवर खाना पचाने का कार्य करता है, यदि लीवर ठीक से कार्य न करे तो हमारा खाना
नही पचेगा एंव दुषित पर्दाथ शरीर से बाहर नही निकल पायेगे , शरीर में दूषित पदार्थो के कारण शरीर में
टयूमर, सिस्ट, गांठे आदि बनने लगते है ।
लिम्फ के अशुद्धी की वजह से थाईराईड की समस्या उत्पन्न होने लगती है , जिससे बजन बढने लगता है , यदि लिम्फ सही तरीके से
काम करता है तो बजन अपने आप घटने लगता है , लिम्फ के सही तरीके से काम
न करने के कारण कई प्रकार की समस्याये उत्पन्न होने लगती है इसकी वजह से
महिलाओं में बांझपन , पुरूषों में नमर्दी , या र्स्पम काउन्ट कम या
कमजोर होना या न बनना, इंपोटेन्सी की समस्या, आदि समस्याये उत्पन्न
होने लगती है । इसके साथ ही महिलाओं में माहवारी की समस्या , या प्रदर में दुर्धन्ध का
आना ,लिकोरिया, यूटीआई की समस्या, आदि उत्पन्न होने लगती है
।
लिम्फ के सही तरीके से
कार्य न करने के कारण हार्मोस प्रभावित होते है इससे बुजुर्गो में प्रोस्टेट का
बढना या सुकड जाना बार बार पेशाब होना या पेशाब का रूक जाना आदि समस्याये होती है
ऐसी अवस्था में इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों जैसे वेन-1 , सी-17
या अन्य के साथ करने पर बहुत ही अच्छे परिणाम मिलते है । इस औषधिय का प्रभाव समस्त लसिका संस्थान एंव कोषा विशेष संस्थान पर है
। यह लिम्फ को तैयार करती है एंव उसे उचित स्थान तक पहुंचाती है । भोजन पच कर जब
रस बन जाता है तब इस दवा का कार्य प्रारम्भ होता है । उन रोगों में जो रस को
सोखने वाले और लसिका वाहिनी और मूत्र संस्थान से सम्बन्ध रखते हो ,श्लैष्मिक कलाओं (म्युकस मैम्बरैन) ,गृन्थियों ,ग्लैन्ड पर इसका विशेष प्रभाव होता है, यह रस और रक्त दोनों के
लिये बलवद्धर्क एंव रक्त शोधक की तरह कार्य करता है । छाती की पीडा, श्वास कष्ट , नजला, दमा , ग्रन्थियों की सूजन या उसका
कडा हो जाना ,त्वचा पर जीवित वस्तु का रेंगता हुआ सा प्रतीत होना , सूखी खुजली, दॉतो का नासूर , घेघा ,गठिया, पागलपन के दौरे , बबासीर चाहे खूनी हो या
बादी इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करने पर बहुत ही अच्छे परिणाम मिलते
है । हाथ पैरो में अधिक पसीना आना , मांसपेशियों की कमजोरी ,बच्चों में कम्पन्न रोग , व सूखे रोगों में ,यह दवा एस ग्रुप और ए ग्रुप के बीच की औषधिय है
अत: यह रक्त एंव रस (लिम्फ) दोनों को शुद्ध करती है और दोनों के
कार्यो में आई असमानता को दूर करती है , जैसा कि पहले ही कहॉ गया है कि यह औषधिय
बलवद्धर्क, बच्चों
के शारीरिक विकाश में सहयोग करती है इसके साथ ही यह स्मरण शक्ति को भी बढाती है ।
बुखार किसी भी प्रकार का हो चाहे ठण्ड दे कर आये या अंतर देकर आने वाला बुखार
जिसे पारी से आने वाला बुखार भी कहते है इसमें भी यह औषधिय अपनी सहायक औषधियों वाई
ई एंव वर के साथ प्रयोग करने से अच्छे परिणाम देती है । यह दवा एस ग्रुप ऐव ए
ग्रुप के बीच की औषधिय है इसीलिये यह रक्त एंव रस दोनो को शुद्ध करती है उनके
कार्यो की असमानता को ठीक करती है इसीलिये यह बात, पित, कफ की अवस्था को समान करती
है ।
4- कैन्सेरोसोज:- चौथे वर्ग में शरीर पर कार्य करने वाले अवयवों तथा सैल्स एंव टिश्यूज की बरबादी एंव उनकी अनियमिता से उत्पन्न होने वाले रोगों पर कार्य करती है रखा गया एंव यह कैन्सेरोसोज के नाम से जानी जाती है इस समूह में कुल 17 औषधियॉ है ।
कैंसरोसोज-1
यह दवा कैंसरोसोज समूह की अन्य औषधियों की तरह
केाशिकाओं एंव सूत्रों (टिश्यू) पर कार्य करती है । यह स्त्रिीय रोगों की विशेष
औषधी है परन्तु ऐसा नही है कि यह दवा स्त्री रोगों के अतरिक्त कार्य नही करती
यह पुरूषों के बहुत से रोगों के अतरिक्त और भी कई प्रकार की समस्याओं पर इसका
बहुत ही अच्छा कार्य है । इस दवा का प्रभाव पिटूटरी ग्लैण्ड पर है पिटूटरी ग्लैण्ड
को मास्टर ग्लैण्ड भी कह सकते है । इससे प्रमुख रूप से दो प्रकार के हार्मोन्स
निकलते है बेसोप्लेसी एंव आक्सीटोसिन , बेसोप्लेसी हार्मोन्स का प्रभाव किडनी पर होता
जिसमे रक्त को छानने की प्रकिृया होती है । आक्सीटोसिन हार्मोन्स का कार्य स्त्रीयों
के लेबर पेन एव बच्चों के जन्म के पश्चात दुध निर्माण का कार्य करती है , यह हार्मोन्स पुरूषों के स्पर्म कम होने या फिर
अन्य प्रकार के स्त्री पुरूषों के जेनाईटल रोगो पर भी कार्य करती है । इस दवा का प्रयोग शरीर में
कही भी गाठों का बनना यहा शरीर में गर्भाश्य में सिस्ट या धॉव होना । यह प्रथम
स्तर के कैंसर जो शरीर में कही भी हो प्रयोग की जाती है । पी0सी0ओ0डी0 (Poly
Cystic Ovarin Disease) की समस्याओं पर जिसमें पीरियड देर से आता है ,बजन बढने लगता है, दर्द के साथ मासिक का होना , सफेद पानी जाना, पेशाब की
जगह खुजली व र्दद , बच्चादानी में गांठ , बच्चादानी के मुंह पर सूजन , ओवरी सिस्ट ,
स्त्रीयों की बीमारी जैसे माहवारी का समय पर न
होना या कम ज्यादा होना अधिक दिनों तक बने रहना या जल्दी जल्दी होना या माहवारी
में रक्त अधिक आना या बिलकुल भी न आना , पीरियड के समय अत्याधिक र्दद व कमजोरी का होना , स्त्रीयों का बांझपन, ओवन का न बनना ,लिकोरिया, गर्भाधारण न कर सकना अर्थात गर्भपात होना, प्रसव पीडा इस दवा के देने से प्रसव आसानी से व
सुरक्षित हो जाता है । प्रसूति ज्वर में, स्त्रीयों
के सभी प्रकार के रोगों में कमजोरी रक्त की कमी, दुध कम
होना , यह दवा पुरूषो के जेनाईटल आर्गन्स पर भी अच्छा
कार्य करती है स्पर्म की कमी स्पर्म काऊंट कम या कमजोर होना , पुरूषों के बांझपन , नर्मदी , नपुसकता यू0टी0आई (Urinar)की समस्या जैसे पेशाब का रूक रूक कर होना पेशाब में जलन मूत्राश्य
की समस्या आदि में इस दवा का प्रयोग अपनी सहायक औषधी के साथ कर अच्छे परिणाम
प्राप्त किये जा सकते है । चूंकि यह दवा हार्मोन्स ग्लैण्ड पर कार्य करती है
अत: हार्मोन्स बेलेंस को बनाये रखती है । शरीर से विजातीय पदार्थो को निकालती है , रक्त व रस को शुद्ध व बेलेंस करती है । शरीर के
किसी भी अंग में चैन्ज हो रहा हो तो उसे ठीक करती है । चर्म रोगों में ,ट्यूमर , गाठों, या ऐसे
गाठ जो पक रही हो या कडी हो मस्से , साईनोवाईटिस , शरीर या गॉठों से पानी रिसता हो या पीब निकलती हो
छीके, छीकों में पानी बहता हो , बलगम निकल रहा हो । इसका प्रभाव पाचन तंत्र पर भी
है । पीठ का र्दद, कन्धों का र्दद, आधासीसी
का र्दद , हाई या लो ब्लड प्रेसर, निष्कासन तंत्र पर , पेशाब के रूकने या बूद बूद होने पर मूत्राश्य में जलन
सूजन आदि पर । कुछ गृन्थकारों का कहना है कि यह दवा हमारे मास्टर ग्लैण्ड पर
कार्य करती है इसलिये यह औषधी में मास्टर औषधी है । इस दवा के प्रयोग से स्पर्म
काऊट बढ जाते है ।
कैंसरोसोज-2 या सी-2
जिस प्रकार एस-2 मूत्र संस्थान के सभी रोगों
में कार्य करती है ठीक उसी प्रकार सी-2 भी मूत्र रोगों पर कार्य करती है , परन्तु इसमें ऐनाटामिकल एंव फिजियोलाजिक
परिवर्तन होना अवश्यक है । कैंसरोसो समूह की दवाये कोशिकाओं एंव सूत्रों
पर कार्य करती । इसलिये कोशिकाओं व सूत्रों की बरबादी पर इसका प्रयोग किया जाता है
। सी-2 दवा का प्रयोग मूत्र संस्थानो के समस्त प्रकार के रोग जैसे पेशाब का
संक्रमण , पेशाब का रूक रूक कर आना, पेशाब में जलन , बदबू आना , किसी भी तरह का सूजाक गनोरिया, सैक्सुवल ट्रांसमीन, यदि कोई रोग मूत्र मार्ग से होता हुआ उपर की ओर
बढने लगे ,
सी-1 दवा से जब कार्य न बने तो इस दवा को देना
चाहिये चूंकि यह बहुत कुछ सी-1 की तरह से कार्य करती है । सी-2 एंव एस-2 एक दूसरे
की पूरक ओैषधी है । जिस प्रकार सी-1 प्रथम स्टेज के कैंसर पर कार्य करती है, उसी प्रकार यह दूसरे स्तर के कैंसर पर कार्य
करती है, कैसर कही भी हो कैसा भी हो यदि दूसरे स्तर का
है तो इस दवा को नही भूलना चाहिये । स्त्रीयों के रोगों में इसका प्रयोग सी-1 में
बतलाये अनुसार है जैसे माहवारी की समस्याये , लिकोरिया, पी सी ओ डी की समस्या, ओवरी में पानी भर जाना , गर्भाश्य का कैंसर, यूट्रस का कैसर या गर्भाश्य यूट्रस में सिस्ट
गाठों का बनना ,गर्भाश्य का नीचे लटक जाना, बेजाइना का सुकड जाना , गर्भाश्य में पानी भर जाने से संतान उत्पत्ती
की समस्या ,वृद्ध व्यक्तियों के प्रोस्टेट की समस्याये, प्रोस्टेट का कैसर ,प्रोस्टेट का बढ जाना, यह दवा जैसाकि हमने ऊपर कहा है यह कोशिका एंव
सूत्रों की दवा है अत: इसके साथ फंगशनल औषधी जैसे एस, एल, एफ समूह की औषधीयों का प्रयोग करना चाहिये ।
जिद्दी किस्म के गाठों का गलाने में ,या पथरी कोक गलाने में सी-4 के साथ सी-2 साथ ही अन्य सहायक औषधीयों का
भी प्रयोग कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
स्त्रीयों का गर्भधारण न होना या बार बार
गर्भपात होना , बांझपन की समस्या, पुरूषों में इंम्पोटेंसी की कमी ,र्स्पम कमजोर या कम होना , जिससे संतान उत्पत्ती की समस्या, प्रसव से जुडी समस्याओ , एंव सुखद प्रसव के लिये ,पथरी कहीं भी हो चाहे वह गालब्लेडर में हो या किडनी में हो सभी
तरह के पथरी रोगों पर यह अपनी सहायक व पूरक औषधीयों के साथ कार्य करने पर अच्छा
कार्य करती है । मांस पेशियों में किसी भी तरह का र्दद
पाचन तंत्र की समस्या यह दवा लीवर के कार्य
क्षमता को बढाती है ,शरीर में कहीं भी पानी भर गया हेा जैसे पेट में
पानी भरना जलोदर, हाईड्रोसिल अंण्डकोशो में पानी भर जाना , रक्त में यूरिक ऐसिड, कैटिनीन आदि के बढने पर, जिद्दी प्रकार का कब्ज , ऑखों के नीचे, ओढों, मसूढों पर सूजन गाठें व र्दद होने पर सी-5 सी-2 बी ई के साथ प्रयोग
करने से आशानुरूप परिणाम मिलते है । जिद्दी प्रकार की खॉसी में पी-8 सी-2 के साथ
प्रयोग करना चाहिये इससे कफ भी आसानी से निकल जाता है । शरीर के अंतरिक अंगोंमें
खुजली, हाथ पैरों में सूजन एस-6 सी-2 के साथ प्रयोग करना चाहिये । यह हर
प्रकार के टी बी रोग चाहे टी बी फेफडों में हो या हड्डीयों ,या मस्तिष्क में अपनी पूरक व सहायक औषधीयो के
साथ प्रयोग करना चाहिये ।ं
कैंसरोसोज-3
यह दवा भी कैंसरोसोज ग्रुप की अन्य दवाओं की
तरह से कोशिका एंव टियूश्ज रिमेडीज दवा है साथ ही इस
दवा का प्रभाव विशेष रूप से त्वचा पर है , यह त्वचा के नीचे की कोशिकाओं पर प्रभावी
होने से त्वचा के कोशिकाओं और टिशूज की बरबाद एंव उनके सडने, गलने , धॉव ,गूमड आदि के दूषित मवाद एंव अनावश्यक तत्वों को निकाल कर नये
सेल्स एंव टिशूज का निर्माण करती है , यह दवा त्वचा की बरबादी व
क्षय को रोकती है । इस दवा का प्रभाव रक्त की छोटी छोटी वाहिकाओं जिसे कैपेलरी अर्थात केशिकाओं कहते है होता है, इसका प्रभाव हड्डीयों पर होने से हड्डीयों के
सडने गलने उसके हड्डीयों बड जाने पर, कार्टिलेज, हड्डीयों के जोडों का हट जाना या कडा हो जाना
उसमें सूजन आदि पर है, इसका
प्राकृतिक गुण पेशाब व पैखाना लाने वाला एंव कैंसर अण्ड प्रदाह नाशक है। इसका
प्रभाव स्पाईनल नर्व पर है किन्तु विशेष रूप से संवेदन शील स्नायु (सेंसरी
नर्व)
त्वचा रोग :- यह दवा त्वचा के सभी
प्रकार के रोगों में प्रयोग की जाती है जैसे त्वचा में खुजली , एलर्जी , एक्जीमा, एक्जीमा में पानी का बहना, ल्युकोडर्मा, सोरायसिस, मुंहासे , मस्से , कार्न, लिपोमा, जलीय स्त्रावों , त्वचा पर दांग एंव धब्बे, दाद (रिंग वर्मं), त्वचा के नष्ट होने पर, त्वचा पर दाने निकलना, पित्ती उछलना, त्वचा में धॉव या गाठे बनने पर , त्वचा के सेल्य व उसके सूत्रों की बरबादी पर , कैंसर के रोगों पर कैंसर के तीसरे स्टेज तक
पर इसका प्रभाव होता है । यह दवा त्वचा रोग की बहुत अच्छी दवा है , त्वचा रोगों में इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधी
एस-3 के साथ करने पर बहुत ही अच्छे परिणा मिलते है । सी-3
एंव एस-3 दवा स्कीन के तीसरे लेयर तक कार्य करती है, इसलिये
यह त्वचा रोगों में बडे ही अधिकार पूर्ण ढंग से प्रयोग की जाती है । चर्म उदभेद ,आग या तेजाब से जल जाने पर इसका अंतरिक एव वाहय प्रयोग अपनी सहायक औषधियों
के साथ करने पर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । त्वचा रोग की पूरानी
एंव जिद्दी प्रवृति की बीमारीयो में
हड्डीयों के रोग :- यह दवा हड्डीयों के रोगों पर भी अच्छा कार्य
करती है, सी-3 दवा साफ्ट बोन को ध्यान
में रख कर बनाई गई है । यह दवा शरीर की लम्बी हड्डीयों पर भी अच्छा कार्य करती
है , घूटनों के कार्टिलेज का कडा
हो जाना या घिस जाना, बढ
जाना जिसकी वजह से घुटनों में र्दद व सूजन होना, घुटनों का मुमेन्ट का न होना , हड्डीयों में र्दद, हड्डीयों के म्यूकस मेम्बरेन में सूजन व
उसका सक्त हो जाना, छोटे छोटे जोडों , नाक , गले की हड्डी का बड जाना ,कैंसर चाहे वह शरीर के किसी भी स्थान में जैसे मुंह , छाती , जनन अंगों में इस दवा का प्रयोग
अन्य सहायक औषधियों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । रीड की
हड्डी का टेडा पड जाना, हड्डीयों के बड जाने पर एंव
हड्डीयों के क्षय होने पर इसका प्रयोग सी-4 के साथ करना चाहिये हाथ पैर के जोडो का
अपनी जगह से हट जाना उस का कडा हो जाना आदि में प्रयोग की जाती है । यह दवा जोडों
में चिकनाई पैदा करती है । हड्डीयों के सडने गलने पर, यह
दवा त्वचा रोग के अतिरिक्त हड्डीयों की प्रमुख औषधि है ।
पाचन सम्बधित रोग :- इस दवा का प्रभाव छोटी आंत
एंव उसके सेंसरी नर्व पर होने से अतिसार, पुराने
डायरिया, बच्चेां के दांत निकलते समय पानी की तरह के
दस्तों के होने पर , आंतों के रोगों की प्रारम्भिक
अवस्था में ,अजीर्ण, अपच,
स्त्री पुरूषों के जननेन्द्रीय रोग :- इस दवा का प्रभाव सेंसरी
नर्व पर होने से यह स्त्री पुरूषों के जननेन्द्रीय रोगों पर अपना प्रभाव रखती है, इसीलिये इसका प्रयोग उत्तेजना की कमी, लिंग का
छोटा होना या टेडा पड जाना, बच्चादानी में धॉव
ग्रंथियों के रोग :- यह दवा पहले कडी और सक्त
ग्रंथियों को मुलायम करती है इसके बाद उसे सुखा देती है ,इसीलिये घेघा रोग में इसके प्रयोग से ग्रंथी पहले मुलायम हो कर
ढीली हो जाती है बाद मे सूख जाती है इसलिये इस दवा का प्रयोग ग्रंथियों के रोगों
पर अपनी सहायक औषधियों के साथ किया जाता है ।
अन्य रोग:- सूखा रोग, टी0बी0 कठमाला, उपदंश , जीर्ण जुकाम, लंग की सूजन एंव
र्दद, नाक, कान , आंख , जबडे, गला , स्तन, लोवर ऐब्डेामिन जांध, नासूर , मांसपेशियों में र्दद, आदि में प्रयोग की जाती है ।
कैंसरोसो-4 (C-4)
इस दवा का निर्माण निम्न
औेषधीय पौधों को एक निश्चत अनुपात में मिला कर तैयार किया गया है ।
यह दवा सभी प्रकार के चौथे स्तर के कैंसर को ठीक करती है कैंसर किसी भी प्रकार व कहीं भी हो इस दवा का प्रयोग किया जाता है । सभी प्रकार के हड्डी रोगों की यह महा औषधी है । बच्चों के विकास में उनकी हड्डीयों का विकास करती है एंव हड्डीयों को मजबूत बनाती है इसलिये इसका उपयोंग बच्चों की लम्बाई बढाने में किया जाता है । यह भी टिश्यू रिमेडी दवा है , दर्द चाहे वह कहीं का हो मॉस पेशियों का हो ,हड्डीयो के र्दद ,हड्डीयों के जोडों, में र्दद , जोडों के लिंगमेन्ट का सूख जाना उसमें मोमेन्ट न होना , व सूजन व र्दद का होना ,यह दवा कैल्शियम व फॉसफोरस को बेलेंस करती है व एक्जारब कर हड्डीयों को मजबूत बनाती है यह दवा विटामिन डी की कमी को पूरा करती है । विटामिन डी की कमी से जो भी रोग उत्पन्न होते है उसमे इसका प्रयोग किया जा सकता है,यह दवा । यह दवा हार्मोंल्स इनबेलेंस को ठीक करती है । हड्डीयों का बढ जाना, मुलायम हो जाना , टेडा पड जाना, हड्डीयों का कैंसर हड्डीयों का टूट जाना फैक्चर हो जाना यह हड्डीयों को जोडने में सहायक है, हड्डीयों में सूजन उसका कठोर हो जाना, कुबडापन, हड्डीयों का मुड जाना, कुबडापन, मोच व ऐडी के र्ददों में अपनी सहायक औषधी के साथ प्रयोग कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । बच्चों के रिकेटस रोग में,साईनस रोग, नॉक की हड्डीयों का टेडा होना, हड्डीयों का बढ जाना, नाखुनों का काला पडना या नाखूनों का टूटना , उसमें स्क्रेच, बनने पर बालों का झडना, शरीर के किसी भी हिस्सों में गाठ बनने पर , मुहासे जिसमें पीव निकलती हो । जोडों में या मॉस पेशियों में यूरिक ऐसिड के जमा होने से दर्द होने पर, जोडों में आई सूजन या कडापन,गठिया रोग, शरीर में फोडा फुंसियो से पीब का निकलना , यह मवाद को निकालने व सुखाने में भी सहायक है । बच्चों के दॉत का देर से निकलना या दॉत निकलते समय तकलीफ होना, यह दवा दॉतों को मजबूत बनाती है । इस दवा के प्रयोग से मेाटापा को घटाया जा सकता है , यह शरीर में जमे पानी केा निकालने में भी सहायक है । हड्डीयों के कैंसर में हड्डीयों के टी बी में इसका प्रयेाग अन्य सहायक औषधीयों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । कैंसर के फोडे व सुखाने में बहुत ही उपयोगी है । किसी भी पत्थर की तरह की कठोर गॉठ, हड्डीयों का गलना, हड्डीयों के ट्यूमर, अस्यिों के ऊपर की झिल्लीयों , कूल्हे की हड्डीयों के रोग, अण्डकोश में पानी भर जाना, रीड की हड्डीयों के रोग ,रीड की हड्डीयों की फैल्सीविटी का कम हो जाना , कडा होना , मुडना जैसे बुढापे में कमर का झुक जाना आदि पर , कैंसरोसो-5
इस औषधिय का कार्य क्षेत्र विस्तृत है, सभी तरह के रोगों इसका प्रभाव में 90 प्रतिशत तक
है । यह सैल्स एंव टिश्यूज रिमेडिज दवा है , इस दवा का प्रभाव समस्त ग्रथियों के सैल्स एंव
टिश्यूज के साथ लीवर के सैल्स एंव टिश्यूज, पर अधिक है, इसके साथ यह स्पाईनल नर्व , तथा अंगों को संचालित करने वाले नर्व पर सिम्फाईटिक
नर्व , चालक पेशियों , मसल्स और नर्व के चालक स्थानों पर है ,यह पाचन संस्थान, फेफडों और मॉसपेशियों के साथ
शरीर के सभी अवयावों को प्रभावित करती है, त्वचा के अंतरिक एंव बाहय
भागों को भी प्रभावित करती है । यह कैंसोरोस ग्रुप की सबसे शक्तिशाली दवा है जिस
प्रकार एस-5 स्क्रेाफोलोसो ग्रुप की शक्तिशाली एंव गहरा प्रभाव रखने वाली दवा है , ठीक उसी प्रकार यह अपने ग्रुप
की एक शक्तिशाली दवा है । इस दवा का स्त्रीय पुरूष के रोगों में ,दिमाकी रोग किडनी रोग,लीवर , हड्डीयों
के रोग, पथरी, बबासीर, गाठे, टयूमर, फाईब्राईड, टयूमर , सिस्ट , शिराओं, वक्षस्थल, मॉसपेशियों, पाचन के पोषक तत्वों, संधिवात, मलाश्य,कर्ण आदि
रोगों पर सफलतापूर्वक कार्य करती है । इस दवा का प्राकृतिक गुण चोट,हिदय रोग,पेट के रोग,मूत्ररोग नाशक है , सी-5 किटाणुओं को नष्ट करती है, एंव रोगों से सुरक्षित रखने
वाली बलवर्धक पाचन क्रिया को सुधारने वाली रक्त शोधक दवा है ।
सैल्स एण्ड टिश्यूजएंव त्वचा रोग :- कैंसरोसो ग्रुप की सभी दवाये
कोशिका एंव तन्तुओं के निर्माण कार्य की सहायक औषधियॉ है इसी लिये इस दवा का
प्रयोग शरीर में गांठों , सिस्ट ,टियूमर, तथा धॉव, मुंहासे, मस्से, त्वचा पर दाने निकलना,चर्म उद्भेभेद, आदि होने पर या त्वचा
रोग जिसमें त्वचा के रंग या बदरंगी त्वचा ,जीर्ण त्वचा रोग , ल्युकोर्डर्मा, सोराईसेस , विशैले धॉव, गैगरिन , यह धॉवों को पका कर सुखा देती
है एंव वहॉ की त्वचा का पुन: निर्माण कर उसे स्वस्थ्य बना देती है । कैसर किसी
भी स्तर का हो चाहे वह पॉचवे स्टेज का हो उसे स्वस्थय करने में पूर्ण रूप से
सक्क्षम है । शरीर में किसी भी तरह की कठोर गाठों को यह गला देती है या निकाल
देती है । मॉसपेशियों का सूखना,
मूत्ररोग जेनाईटल आर्गन के रोग :- केाई भी ऐसा रोग जो मूत्र मार्ग से होता हुआ शरीर के
किसी भी स्थान पर पहुंच गया हो , सभी
तरह के ग्लैण्डस से जुडे रोग ,पैराथाईराईड, प्रोस्टेट के रोग , हार्मोनल इन बैलेंस , एंव स्त्री पुरूष के हार्मोन
से जुडे सभी तरह के रोग,स्त्रीयों में पीरियड से जुडे रोग (माहवारी से जुडे रोग), यूटरस में टयूमर या गाठों का
होना या कैंसर, पुरूषों में र्स्पम काउन्ट का कम होना, इंपोटेंशी का कम होना, स्वप्न दोष , गलब्लैडर की समस्या , पथरी सी-1 के अर्न्तगत आने
वाले बहुत से रोग इस दवा के क्षेत्र में आ जाते है जैसे बांझपन , ल्युकोरिया, प्रसंव के समय स्त्रीयों में
अत्याधिक पीडा होना, गर्भाश्य की एंठन , माहवारी में पीडा होना , गर्भाश्य की सूजन, बहुमूत्र, मधुमेह रोगों में सी-17 के साथ
प्रयोग करना चाहिये , सुजाक रोग में वेन ग्रुप की
दवाओं के साथ प्रयोग कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । यह दवा मधुमेह के
रोगियों के धॉवों को भरने में उपयोगी है ।
र्दद :- कोई भी ऐसा रोग जो यूरिक ऐसिड ,कैटेनाईन या यूरिया की वजह से हो,या शरीर में टाक्सीन की वजह से हो, इसकी वजह से यदि हिद्य रोग हो
गया हो या गठिया , जोडों में र्दद , कमर का र्दद , सरवाईकल स्पेन्डोलाइसेस, ऐडी का र्दद, हिप ज्वाईट का र्दद, सी-5 हड्डीयों की अच्छी
दवा है , जोडों का कडा हो जाना
लीवर:- फैटी लीवर , एस0डी0, ओ0टी0 का बढना, हेपाटाईटिस, लीवर की सूजन या कडा होना, लीवर का फोडा
श्वसन रोग:- छाती के रोग साईनस की समस्या, झींके आना, नाक की हड्डी का बढ जाना, सायनोसाईटिस, पुरानी खॉसी, दमा, निमोनिया, तालु ग्रथियों की सूजन, स्वर यंत्रों की सूजन , गले सं सम्बन्धित समस्त
परेशानीयों में , निगलने में परेशानी, टांसिल का होना या बार बार होना, फेफडों की प्रदाह, एंव धॉव, वायु प्रणाली से दुर्गन्धयुक्त
बलगम का निकलना, मुंह के अन्दर के रोग , गले में धॉव, दॉतों के रोग, मसूढों का क्षय , मसूढों का सडना आदि में इस दवा
के कुल्ला या गरारे करने से एंव अंतरिक प्रयोग से बहुत ही अच्छे परिणाम प्राप्त
किये जा सकते है ।
अन्य रोग:- बच्चों का दांत निकलने में
परेशानी , या बच्चों की लम्बाई का न बढना , बच्चों के सूखा रोग में, बजन का न बडना , या यह दवा बजन बढाने एंव घटाने
में अपनी सहायक औषधियों के साथ प्रयोग करने पर बहुत ही अच्छे परिणाम देती है ।
सभी तरह के बुखार के रोगों में, पुराने बुखार, टाईफाईड, चिकिनगुनिया, क्षय रोग ,ठंड देकर आने वाले बुखार , जलोदर, बहरापन, मोतिया बिन्द, डिप्थीरिया, फीलपांव,बालों का झडना, गठिया,लकवा एंव क्षय रोग में इसका प्रयोग अपनी पूरक एंव
सहायक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
मस्तिक रोग:- ब्रेन से जुडे रोग जैसे नीद न आना, याददास्त का कमजोर होना, ब्रेन में टयूमर, गाठों का होना, मिर्गी के दौरे या मिर्गी रोग , हिस्टीरिया, पागलपन, सिर की पीडा, आधाशीशी का र्दद,
पांचन तंत्र के रोग:- इस दवा का प्रभाव पाचन तंत्र पर
होने के कारण पुरानी अजीर्ण ,हिचकी आना , ऑतो
में सूजन, पेचिस, पेट का फूलना, खटटी डकार का आना,जीर्ण अपच, आदि में इसका प्रयोग अपनी सहायक
एंव पूरक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
सी-5 की सहायक औषधियॉ एस-5, ए-2,एफ-1, पी-2 एंव जी0ई0 है तथा इसकी
पूरक औषधी एस-1,सी-1 एंव सी-3 है ।
5- फैब्रिफ्यूगोज :- पॉचवे वर्ग में वात संस्थान नर्व सिस्टम पर कार्य करती है इसे फैब्रिफ्यूगोज नाम से जाना जाता है इस समूह में कुल 2 औषधियॉ है ।
फेब्रीफ्यूगो-1
वैसे तो इस दवा का प्रयोग साधारणत: बुखार व र्दर्दो के लिये बडे ही विश्वास के साथ किया जाता है । इस दवा का प्रभाव हमारे नर्व सिस्टम पर होता है इसका प्रमुख प्रभाव हमारे शरीर की अनैच्छीक या स्वाचलित स्नायु पर है अर्थात ऐसे नर्व जो स्वयम चलते है जिस पर हमारा अधिकार नही होता जैसे हिद्रय का धडकना , रक्त नलिकाओं का रक्त संचालन , पाचन संस्थान के कार्य, पेनक्रियास, अमाश्य, डियुडिनम, हिद्रय, फेफडे, ऑखो के एक्युलो मोटर नर्व, स्लाईवरी गैल्डस ,ग्लोसो फैरिजियल स्नायु, इत्यादी और भी बहुत से अंग है जिन पर हमारा अधिकार नही होता इन्हे अनैच्छिक नर्व कहते है , इसके साथ ही इस दवा का प्रभाव ऐक्छिक नर्व पर भी है ऐक्च्छिक नर्व पर भी है , ऐच्छिक नर्व पर हमारा अधिकार होता है जैसे पेशाब या मल त्याग करना ,बोलना , चलना , ऑखों को बन्द करना या खोलना , आदि इसके साथ इस दवा का प्रभाव सिम्फाईटिक नव , पैरा सिम्फाईटि नव तथा इन दोनो नर्व को नियन्त्रित करने वाली वेगस नर्व पर होने से यह इन दोनो नर्व को संतुलित रखती है । इसका प्रभाव स्पाईनल र्काड के नव तथा मस्तिष्क के ब्रहद एव लधु नर्व पर भी है तथा ये समस्त नर्व हमारे शरीर के संचालन एंव स्वस्थ्यता हेतु नितांत आवश्यक है किसी भी नर्व के कार्य न करने से विभिन्न किस्म की स्नायु संबधित बीमारीयॉ होने लगती है , जैसे पागलपन , मिर्गी के दौर या मिर्गी रोग , स्त्रीयों व युवा बच्चीयों में हिस्टीरिया , तनाव, नीद न आना , बुरे सपने , नीद में चलना , माईग्रेन , चिडचिडापन ,याददास्त की कमी यदि हिद्रय के स्नायु कार्य न करे तो पाचन तंत्र से सम्बधित बीमारीयॉ होने लगती है जैसे खाना न पचना, ऐसिडिटी, खट्ठी डकारे आना, कभी कब्ज तो कभी पतले दस्तो का होना ऐसी स्थिति में इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये । सेन्ट्रल नर्व सिस्टम पर कार्य करने के कारण यह दवा जहॉ दिमाकी बीमारीयों पर कार्य करती है वही इसका प्रभाव हिद्रय के स्नायु पर होने से हिद्रय का रूक रूक कर चलना या धडकन का बढना , ब्लाकेज होना , हिद्रय में जकडन या र्दद होने डब्लू बी सी ,आर बी सी का कम या अधिक होने पर भी इसका प्रयोग ए ग्रुप की औषधियों के साथ करना चाहिये । लकवा , पोलियो, खून की कमी , तंत्रिका तंत्र के या वेन के सेल्स के मृत होने पर, शरीर में कही पर भी सूजन होने पर इस दवा को नही भूलना चाहिये । उपरोक्त स्नायु संस्थान के अतरिक्त गति करने वाले स्नायु, संवेदना वाहक, सेरिर्बो, कार्नियल नर्व, ग्रे मोटर, चालक स्नायु, तथा मस्तिष्क की झील्लीयॉ भी इसके प्रभाव क्षेत्र में आती है कुछ मिला कर यह हमारे सम्पूर्ण स्नायु तंत्र को प्रभावित करती है ।
किसी भी दवा के देने पर यदि उसका प्रभाव न हो तो ऐसी स्थिति में एफ-1 दवा को देने से वही दवा अपना अभिष्ट कार्य करने लगती है ,यह दवा उत्प्रेरक का कार्य भी करती है अर्थात हमारे शरीर के कार्यो को बढा कर उसे सुव्यवस्थित कर देती है अत: इस बात को रेखाकिंत करना चाहिये । पुरूषों व स्त्रीयों के रोगों में इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये । ऐन्टीबायेाटिक दवाओं के दुष्प्रभावों को यह दवा ठीक कर देती है , रक्त संचालन करने वाले नर्व को यह शक्ति प्रदान करती है ।
बुखार व र्दद :- बुखार किसी भी प्रकार का हो, सभी तरह के बुखार जैसे वायरल फीवर, चिकिनगुनिया, डेगू, टायफाईड , मलेरिया, मेनेजाईटिस, यू0टी0आई0 इनफेक्शन , किसी भी तरह के इंफेक्शन की वजह से बुखार आने पर हड्डी तोड बुखार , सर्दी का ज्वर, संक्रामक ज्वर, छूत की बीमारी, ऐसा ज्वर जिसमें शरीर पर लाल लाल चकते निकलते हो , लू लगना, इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करना चाहिये जैसे बुखार में एफ ग्रुप के साथ वर, एस-10 एंव बाई का प्रयोग करना चाहिये इसके प्रयोग से पसीना आकर बुखार उतर जाता है अर्थात हम कह सकते है कि बुखार किसी भी प्रकार का हो चाहे वह सर्दी लगने इंफलामेशन की वजह से हो या किसी डर की वजह से हो एफ दवा के प्रयोग को कदापी नही भूलना चाहिये , ज्वाईडिस में बिलोबिन बढने पर , कैटिनिन के बढने पर इसका प्रयोंग ए ग्रुप की दवाओं के साथ करना चाहिये
र्दद :- बात रोग जोडों में र्दद नशों में र्दद सिर का र्दद माईग्रेन , अनावश्यक तनाओं की वजह से र्दद होने पर इसे माथे पर एफ-1 एंव डब्लू ई को लगान व खिलाने से र्दद ठीक हो जाता है । यह दवा शरीर में जमा विषाक्त तत्वों को पसीने व मल मूत्र से बाहर निकाल देती है पेशाब रूकने पर इसका प्रयोग एस-2 के साथ करना चाहिये । मांसपेशियों में व जोडों में यूरिक ऐसिड के जमा होने से र्दद होता है इस दवा का प्रयोग करने से यूरिक ऐसिड निकल जाता है इससे जोडो व मॉसपेशियों का र्दद ठीक हो जाता है । यदि शरीर में या पेट में पानी भर गया हो तो उसे भी यह दवा निकाल देती है । फेफडों में बलगम जमा हो तो पेटोरेल ग्रुप की दवाओं के साथ इस दवा के प्रयोग करने से बलगम निकल जाता है । नशा करने वालों के शरीर में जो विषाक्त पर्दाथ जमा हो रहे हो तो यह दवा उसे भी निकाल देती है, इसके साथ ही यह दवा नशा छुडाने में भी अपनी अहम भूमिका निभाती है । पथरी को निकालने में यह दवा अपनी अन्य सहायक औषधियों के साथ प्रयोग करने पर यह दवा वहॉ के स्नायुओं को उत्प्रेरित करती जिससे गली हुई पथरी मूत्रमार्ग से निकल जाती है । कमर र्दद, साईटिका का र्दद,त्वचा रोगों में खुजली में सी-3 एस-3 के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये
एक्जीमा , ल्युकोडर्मा में, लीवर, पिताश्य, पित्त प्रणाली और स्पलीन की यह विशेष दवा है
1-
फेब्रीफ्यूगो-2
इस दवा का प्रभाव एफ-1 की ही तरह है परन्तु जब कभी एफ-1 से लाभ न हो रहा हो तो एफ-2 देना चाहिये । यह दवा अंतरिक प्रयोग के साथ वाहय प्रयोग में भी उपयोग की जाती है , जहॉ एफ-1 का उपयोग अंतरिक रूप से कर रहे हो वही इसके वाहय प्रयोग से और भी जल्दी लाभ मिलता है । यह दवा एन्टीपायरेटिक्स , एन्टीवायरल, एन्टी इंफलामेंशन, नर्वाईन, पसीना लाने वाली है । इसका प्रभाव गहरा होता है । वातज प्रकृति के रोगीयों पर इस दवा का अच्छा प्रभाव होता है । हर प्रकार के दर्दो पर, जीर्ण या जिद्दी किस्म के बुखारों में, सरवाईकल पेन, जोडों के र्दद में , दर्द किसी भी प्रकार का हो एंव कही भी हो रहा हो, बुखार किसी भी प्रकार का हो, इस दवा को मुंह से खिलाये एंव बुखार होने पर इसकी पट्टी माथे पर एंव इसका कम्प्रश करने से पसीना आ कर बुखार उतर जाता है , र्दद वाली जगहों पर इसका कम्प्रेश करने से लाभ जल्दी होता है । त्वचा रोगों चाहे वह ल्युकोडर्मा हो या फिर सोराईसिस,मुह के रोगो, जल जाने पर बी ई के साथ,गले की सूजन, निगलने में परेशानी होना, टॉसिल आदि में इस दवा के गरारे करने से भी लाभ होता है । चूंकि यह दवा सेंसरी नर्व पर प्रभावी होने से त्वचा की अत्याधिक संवेदनशीलता पर भी उपयोगी है ।
बालों की समस्ये जैसे बालों का झडना, सफेद होना ,बालों का गुच्छे के गुच्छे झडना आदि पर इसका उपयोग सहायक औषधीयों के साथ एंव लगाने से उचित परिणाम मिलते है । छाती के गडगडहट में इसका वाहय प्रयोग करना चाहिये । कान से मवाद या कान में छेद होना , मुंह में छॉले, दॉतों में र्दद, मसूढों में छॉले होने पर इसका गरारा करने से उचित परिणाम मिलते है । यह दवा हमारे नर्व केा शक्ति एंव शरीर केा ताकत देती है । तथा इसके प्रयोग से नशा छुडाया जा सकता है । नशा छुडाने के लिये एस-12, सी-12, एफ-1, बी0ई0 का प्रयेाग कर इसमें सफलता प्राप्त की जा सकती है । प्लीहा, यकृत, पित्ताश्य रोग जैसे इनमें सूजन हो या कोई भी बीमारी होने पर इस दवा का प्रयोग शरीर के 24 पाईट पर लगाना चाहिये । मलेरिया के कारण लीवर तथा स्पलीन के बढ जाने पर पसलीयों का चलना, पित्ताश्य की पथरी , लू लगना, ,खॉसी , वृक्कशूल, विशूचिका , लीवर में रक्त संचय, अपच, कुनैन के सेवन से जो उदभेद हो उसके लिये यह रामबाड है । ऐसे रोगी जो बिना किसी बीमारी के अपने आप को अत्यन्त बीमार समझते हो, ऐसे रोगी जो उछलते कूंदते दौडते हो कपडे फाडते हो , विचित्र एंव भयानक स्वप्न देखते हो , यह दवा सूधने व दिृष्टी दोषों पर भी प्रभावी है । यह नेत्र पेशियों के प्ररक स्नायुओं को प्रभावित करती है । एफ-1 एंव एफ-2 दवा एक दूसरे की पूरक औषधीयॉ है । अपच के कारण पेट फूलना , उदर पीडा, हेपाटाईटिस , लीवर की बीमारी, लीवर का बढ जाना, कडा हो जाना, पेट में पानी का भर जाना जलोदर, पीलिया, पागलपन, मधुमेह, कुष्ट रोग,
6- पेट्टोरल्स :- छठे वर्ग में श्वसन तंत्र पर कार्य करने वाली औषधियों को रखा गया जो पेट्टोरल्स के नाम से जानी जाती है एंव संख्या में 9 औषधियॉ है ।
पेट्रोरल्स -1 (पी-1)
इस ग्रुप की सभी औषधियॉ श्वसन तंत अर्थात रिस्पायरेट्री सिस्टम पर कार्य करती है , इसीलिये इनका प्रयोग खॉसी, जुखाम, छीकें आन, एलर्जी, श्वास रोग दमा , आदि पर प्रयोग की जाती है । यह सामान्यत: दस वर्ष से ऊपर की आयु वाले पुरूषों की सामान्य खॉसी के लिये विषेश उपयोगी है । परन्तु किसी भी उम्र के स्त्री पुरूषों की प्रथम स्तर के श्वसन तंत्र के रोगों में प्रयेाग की जा सकती है , यह फेफडों की बलवर्द्धक पौष्टिक औषधी होने के कारण इसका प्रयोग फेफोंडों की दुर्बलता एंव लग्स को बलवर्द्धक बनाने में प्रयोग की जाती है । यह दवा अपने प्रभावित अंगों से किटाणों को बाहर निकाल देती है ।
इस दवा का प्रभाव श्वसनतंत्र के के अवयवों जैसे लग्स , वायु प्रणालीयों और उनकी छोटी छोटी केशिकाओं तथा वायु कोष्ठों पर एंव श्वसन तंत्र के श्लैष्मिक कलाओं अर्थात म्युकस मेम्बरेन पर प्रभावी होने के कारण, श्वास लेने में कष्ट, स्वरभंग, श्वास अवरूद्धता, श्वास नलिकाओं में सूजन ,गले में खरास, टांसिल, सूखी या गीली खॉसी , कफ का गले में जमा होना, काली खॉसी, कुकुर खॉसी, गले में छाले,लग्स का क्षय होना, हलक का प्रदाह, निगलने में परेशानी,खॉसने पर रक्त आना, जख्म आदि जैसे श्वसन तंत्र के रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है । श्वसन तंत्र में केाई भी खराबी आ जाने के कारण जो भी बीमारीयॉ हो उसमें इसका प्रयोग किया जा सकता है । फेफडों का कार्य है आक्सीजन को खीचना तथा कार्बन डाई आक्साईड को शरीर से निकाते रहना , जो प्राणीयों के जीवन का मुख्य आधार है, कुछ बीमारीयों में जो श्वसन तंत्र से सम्बधित होते है उनमें कभी कभी श्वास लेने व आक्सीजन ग्रहण करने में बाधक बनते है उस स्थिति में पी ग्रुप की दवाओं का प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ करने से बहुत ही अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है इन दवाओं के प्रयेाग से मरीज को आक्सीजन देने की जरूरत भी नही पडती एंव इस दवा से हमारे लग्स मजबूत हो कर स्वयम वातावरणसे आक्सीजन ग्रहण करने में सक्क्षम हो जाते है । श्वसनतंत्र से सम्बधित किसी भी बिमारी की प्रथम स्टेज पर इसका प्रयोग किया जाता है । जैसे खॉसी , दमा ,गले में खरास , सूजन ,टांसिल ,जलन आदि में यह दवा ई0 एन0 टी0 अर्थात नाक कान गला आदि के रोग जैसे नॉक ,ऑखों से पानी गिरना, छीकों का आना कान से मवाद या पानी का स्त्रावों पर , यह दवा छाते तथा महिलाओं के ब्रीस्ट के रोग जैसे स्तन में गॉठों का बनना, कैंसर , ,मॉ का दूध न उतरना , स्वर भंग ,इस दवा का प्राकृतिक गुण कफ को ढीला कर निकालने वाला है ।
पी-1 पाचन तंत्र के रोगों में भी अच्छा कार्य करती है , छोटी ऑतों में र्दद , जी मचलाना , अफरा, कब्ज, कभी कब्ज तो कभी दस्त होना आदि में अपनी सहायक औषधी एस-1के साथ प्रयोग कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
पेट्रोरल्स -2 (पी-2)
पेट्रोरल्स -2 औषधी में निम्न वनस्पतियों को एक निश्चित अनुपात में मिला कर बनाई गई है ।
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पेट्रोरल्स -2 श्वसन तंत्र एंव फेफडों के रोगों की व्दीतीय अवस्था के रोगों पर प्रयुक्त की जाती है । टी0बी0 ,ब्रोंकाईटिस, न्यूमोनिया , लंग कैंसर, फेफडों में मवाद, कफ का न निकलना , अर्थात फेफडों से जुडे समस्त प्रकार के रोगों में इस दवा का प्रयोग किया जाता है । फेफडों के एनाटामिकल्स या फिजियोलोजिकल परिवर्तन फेफडों की बनावट में परिवर्तन सडन गलन या सूजन पानी का भर जाना आदि में चूंकि हमारे फेफडों का कार्य है आक्सीजन को ग्रहण करना एंव कार्वन डाईआक्साईड को निकालना आक्सीजन के कारण ही हमे उर्जा मिलती है शरीर के प्रत्येक कोशिकाओं तक ऑक्सीजन पहुचती रहे तो हम स्वस्थ्य रहते है एंव ऑक्सीजन की कमी से विभन्न प्रकार की समस्याये उत्पन्न होने लगती है । यह दवा जहॉ ऑक्सीजन की कमी को दूर करती है वही श्वसन तंत्र से जुडे रोगों पर कार्य करती है एंव रूके हुऐ बलगम को निकाल देती है फेफडों में पानी भर गया हो तो उसे भी आसानी से निकाल देती है । इस दवा का हमारे मुंह के म्यूकस मैम्बरेन पर भी प्रभाव होने से मुंह के छॉलों व मुंह के घॉवों को भरने में भी सहायक है । बीडी सिंगरेट से होने वाले लंग के दूसरे स्टेज के कैंसर में उपयोगी है । निमोनिया में या निमोनिया में कफ अधिक बन रहा हो फेफडे गल गये हो , फैफडों में गाढ बनना , खॉसी , दमा, बलगम फंसा हुआ हो , फैफडों से रक्त आना , फैफडों का सुकड जाना , यह दवा जहा श्वसन तंत्र पर कार्य करती है वही छाती की पीडा एंव हिद्रय रोगों पर भी अपनी सहायक औषधियों जैसे बी ई या ए ग्रुप के साथ प्रयोग करने पर अच्छा कार्य करती है । साईनोसाईटिस की समस्याओं पर , कान से मवाद आने पर भी इसका प्रयोग किया जाता है । इस दवा का प्रभाव अण्डकोष एंव जननेन्द्रयों पर भी होने से अत्याधिक कामवासना के कारण जो लोग र्दुबल या कमजोर हो जाते है उनके शरीर का क्षय होने लगता है खॉसी आने लगती है ,अण्डकोषों में र्दद होना, सूजन होना ,आदि में भी इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । वंशानुगत यदि टी0बी0 का इतिहास मिले तो इसका प्रयोग वेन समूह की दवा के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । इसके अतरिक्त इसका प्रयोग निम्न रोगों पर किया जाता है जैसे कफ का गाढा र्दुगंधयुक्त आना, स्वरभंग, स्वरभंग यंत्र में र्दद काली खॉसी, फैफडों में रक्त का जमा होना सूजन उसका क्षय होना
पेट्रोरल्स -3 (पी-3)
पेट्रोरल्स-3 औषधी में निम्न वनस्पतियों को एक निश्चित अनुपात में मिला कर बनाई गई है ।
पेट्रोरल्स -3 श्वसन तंत्र एंव फेफडों के रोगों की तृतीय अवस्था के रोगों पर प्रयुक्त की जाती है । यह दवा स्त्री एंव बच्चो के श्वसन तंत्र के रोगों में प्रयोग की जाती है परन्तु ऐसा नही है कि यह पुरूषों व अन्य मरीजों पर प्रयोग नही कर सकते रोग अवस्था के अनुसार इसका प्रयोग किया जा सकता है । श्वसन तंत्र, एंव छाती से जुडे रोगों पर , एलर्जी, फैफडों की टी0बी0, लंग कैंसर, फेफडों में मवाद, टी0बी0 ,ब्रोंकाईटिस, न्यूमोनिया , कफ का न निकलना , अर्थात फेफडों से जुडे समस्त प्रकार के रोगों में इस दवा का प्रयोग किया जाता है । यह दवा गहराई से जा कर कार्य करने वाली दवा है । बच्चों व स्त्रीयों के दमा काली खॉसी , सभी प्रकार की खॉसी में , ब्रीस्ट से जुडे रोग महिलाओं में दुध का कम होना या अधिक होना , ब्रीस्ट का विकास न होना , बच्चों व स्त्रिीयों में सर्दी खॉसी व झुखाम का बना रहना, स्त्रीयों में माहवारी से जुडी समस्यायें, ल्युकोरिया, सफेद या गाढा पीला पानी निकलना आदि में सी-3 के साथ या सी-1 के साथ इसका प्रयोग करना चाहिये । बच्चों के हिद्रय रोगों में अपनी सहायक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । यह दवा श्वास लेने में मदद करती है ।
पेट्रोरल्स -4 (पी-4)
पेट्रोरल्स-4 औषधी में निम्न वनस्पतियों को एक निश्चित अनुपात में मिला कर बनाई गई है ।
पेट्रोरल्स -4 श्वसन तंत्र एंव फेफडों के रोगों की तृतीय अवस्था के रोगों पर प्रयुक्त की जाती है । यह दवा वृद्धव्यक्तियों के श्वसन तंत्र के रोगों में प्रयोग की जाती जैसे खॉसी, दमा, न्युमोनिया, टी0बी, ब्रोकाईटिस, श्वास लेने में दिक्कत,श्वास रोग बलगम का बाहर न निकलना , पुरानी खॉसी या वृद्धों की खॉसी आदि में वैसे तो यह वृद्ध व्यक्तियों के लिये फेफडों व सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम पर कार्य करने वाली कारगर दवा है इसीलिये इसे वृद्ध व्यक्तियों का मित्र कहॉ जाता है क्योंकि वृद्धावस्था में प्राय: श्वास या फेफडों के रोग की समस्यायें अधिक हुआ करती है । यह दवा जहॉ वृद्धावस्था के श्वसन तंत्र के रोगों पर अच्छा कार्य करती है ठीक उसी प्रकार से यह सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम पर भी अच्छा कार्य करती है । यह दवा फैफडों के तंत्रिका तंत्र की अच्छी दवा है । उम्र के बढने के साथ साथ फैफडें व नर्व सिस्टम कमजोर होने लगता है इसकी वजह से जो सिंगनल हमारे मस्तिष्क को मिलने चाहिये वह नही मिलते इससे वृद्ध व्यक्तियों को कोई बात कहो या कोई भी निर्णय लेना हो तो उन्हे समझने में काफी परेशानी होती है उनकी याददास्त कमजोर होने लगती है, दिमाकी परेशानीयॉ होना , दिमाक में उल्झन , नीद न आना जैसी समस्याये होने लगती है उसकी इन समस्याओं पर यह दवा अच्छा कार्य करती है । इसके अतरिक्त यह दवा छाती से जुडे रोगों व बातसूत्रों पर भी कार्य करती है । वृद्ध व्यक्तियों के प्रोस्टेट से जुडे रोग, पेशाब का रूक जाना, या रूक रूक कर पेशाब होना, रात्री में कई बार पेशाब होना , पेशाब में जलन, या मूत्राश्य की अन्य समस्याओं पर भी इसका प्रयोग अपनी सहायक औषधियों के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । बीडी सिगरेट गॉजा या नशा करने वालों के जिनके फैफडें खराब हो चुके है फैफडों पर टारटर जम चुका हो या फैफडों के नर्व या फैफडों को क्षति होने फैफडों के शिथिल होने पर भी इस दवा का प्रयोग किया जा सकता है । फैफडों व श्वसन रोग के चौथे स्टेज के रोगों में इसका प्रयोग कर उचित परिणाम प्राप्त किया जा सकता है । पी-1 एंव एफ-1 के अंर्तगत आने वाले रोगों में न्युमोनिया, टी0बी0, दमा, व श्वास रोग की वजह से आई कमजोरी को भी यह दूर करती है । वृद्ध व्यक्तियों के फैफडों का ही नही यह उनके शारीरिक कमजोरी का भी टॉनिक है ।
7-वेनेरियोज –सातवे वर्ग में
वेनेरियोज यह औषधिय सक्ष्या में 6 है एंव इसका कार्य रति सम्बन्धित ,मूत्रसंस्थान
,जननेन्दीय पर प्रभावी है जिसका उपयोग रतिजन्य रोगो व जन्नेद्रीय मूत्र संस्थान
सम्बन्धित पर होता है ।
वेनेरियोज-1
वेनेरियोज-1
इलैक्ट्रो होम्योपैथिक में वेन दवा के बिना उपचार की कल्पना ही नही की जा सकती, विव्दवान चिकित्कों का अभिमत है की यह दवा पचास प्रतिशत रोगों में किसी न किसी रूप में प्रयोग की जाने वाली एक महत्वपूर्ण दवा है । वेनेरियल बीमारीयों से या सैक्सुवल ट्रांसमिशन से होने वाली बीमारी व उसके बाद उनकी संतानों को विरासत में जो बीमारीयॉ चाहे वह कुछ भी क्यो न हो उसमें इसका प्रयोग किसी न किसी रूप में होता है । यह दवा शरीर से विषाक्त पदार्थो को बाहर निकाल देती है ।
वेनेरियल बीमारी:- सेक्सुवल ट्रांसमीशन से उत्पन्न होने वाली समस्त प्रकार की बीमारीयों में इसका प्रयेाग होता है । इससे जो भी बीमारीयॉ बीरासत में बच्चों को हस्तान्तरित होती है उसमें इसका प्रयोग किया जाता है । वैसे तो प्रमुख रूप से यह गनोरिया के रोगों में प्रयोग की जाती है , पेशाब के रोग ,पेशाब में जलन , बूदॅ बूदॅ पेशाब का होना ,पेशाब के रास्ते में इंफेक्शन, पेशाब में पस का आना ,लिग में फोडा, या धॉव आदि होने पर , जेनाईटल आर्गन्स में मस्सों का या फिर गाठों का होना ,मूत्र की थैली में पेशाब का भरा होना बूदॅ बूदॅ पेशाब का होना, पेशाब में जलन के साथ खुजली का होना ,मूत्राश्य में धॉव ,सडन, पस आदि में इसका प्रयोग अन्य सहायक या पूरक दवाओं के साथ कर अच्छे परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । इस दवा का प्रभाव सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम पर होने से यह वंशानुक्रमण व्दारा आये रोगों में जैसे चक्कर आना ,जड बुद्धी व याददास्त का कम होना , श्वसन तंत्र के रोग खॉसी ,बलगम का न निकलना , दमा ,आदि के साथ मिर्गी रोग में भी करते है । इस दवा का प्रधान प्रभाव जेनाईटल आर्गन पर होता है उपदंश की वजह से होने वाले रोग वृक्क रोग नामर्दी ,
त्वचा रोग:- त्वचा के रोग जो वेनेरियल बीमारी की वजह से हो या फिर बिरासत में उन्हे मिला हो उसमें भी यह दवा का उपयोग अन्य सहायक औषधीयों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । त्वचा पर कही पर भी मस्से होना, भूसी उतरना, सोराईसेस, स्कीन एलर्जी , त्वचा का फटना , फोडा, फुंसी, धॉव, सडने वाले धॉव जिसमें बदबू हो , कैंसर के धॉव ,उपदंश के कारण उत्पन्न होने वाले उपर्सग धॉव ,नॉक के मॉस का बढना
स्त्रीयों के रोग:- गनोरिया की वजह से उत्पन्न समस्त रोग जिसका वर्णन उपर किया जा चुका है उसमें इसका प्रयोग अन्य सहायक दवाओं के साथ करना चाहिये , इसके साथ लिकोरिया, माहवारी से सम्बन्धित परेशानीयों व रोग में , हार्मोंस का इन बेलेन्स होने पर , महिलाओं में बांक्षपन, उपदंश के कारण गर्भाश्य के रोग , गर्भाश्य की सूजन ,गर्भाश्य में धूमण या सिस्ट या धॉव , जिद्दी किस्म के लिकोरिया , स्नायु पीडा
पुरूष रोग:- पुरूषों में स्पर्म का कम होना , स्पर्म का कमजोर होना , सीमन की कमी, गुप्त रोग आदि । यह पुरूषों में प्रोस्टेट की बीमारी जिसमें वृद्धावस्था के कारण प्रोस्टेट के बढने पर जिसकी वजह से पेशाब का रूक जाना या बूदॅ बूर्द होना , बार बार पेशाब जाना पेशाब में जलन , पेशाब का पूरा न होना , आदि में इसका उपयोग अन्य सहायक औषधीयों के साथ करना चाहिये । पेनिस को ढकने वाली त्वचा पर होने से फाईमोसिस व पेनिस की त्वचा का उपर नीचे न होने पर भी इसका प्रयोग किया जाता है । स्त्री व पुरूषों के प्रजनन सम्बधित रोगों में जैसा कि पहले लिखा जा चुका है ।
यह दवा किसी भी प्रकार के सिस्ट व गाठों को गला देती है
बालों व नाखूनों :- बालों व नाखूनों की समस्या जैसे बालों का असमय सफेद होना व झडना , गंजापन, नाखूनों का टेढा या नाखूनों का टूटना , नाखूनों का धॅस जाना नाखूनों का काला पड जाना आदि में इसका प्रयोग अन्य सहायक औषधियों के साथ कर आशानुरूप परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
बच्चों के रोग:- बच्चों का शारीरिक विकास न होना , उम्र के अनुसार लम्बाई का न बढना , दॉतों का समय पर न निकलना , याददास्त का कम होना , बच्चों के जेनाईटल आर्गन्स का विकास न होना , बच्चों की बुरी आदतें
बुखार:- बुखार में तो वैसे और भी कई दवाये है, जिसका प्रयोग कर इस रोग में सफलता पाई जा सकती है परन्तु यदि वेनेरियल बीमारीयों की वजह से या अन्य किसी भी दवा से जब बुखार न जाये तो इसका प्रयोग एफ ग्रुप की दवाओं के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । वैसे वायरल फीवर में भी इसके प्रयोग करने की सिफारिश की गई है । यह दवा किसी भी तरह के बुखार में जैसे मलेरिया, वायरल फीवर, चेचक, या कोई भी बुखार हो उसे ठीक कर देती है
पथरी:- पथरी होने पर पथरी के साथ दी जाने वाली दवाओं के साथ इसका प्रयोग करने से यह पथरी को गलाने में सहायता करती है एंव यह अपने गुणों के अनुसार जैसा की पहले ही हमने लिखा है कि यह शरीर से विषाक्त पदार्थो केा बाहर निकाल देती है अर्थात जब पथरी अन्या औषधीयों को देने से गल जाये तब उसे यह शरीर से बाहर मूत्र मार्ग के माध्यम से बाहर निकाल देती है ।
शरीर से विषाक्त पदार्थो को निकालना :- जैसा कि पहले ही कहॉ गया है कि यह दवा शरीर से विषाक्त पदार्थो को निकाल देती है इसी लिये इसका उपयोग यूरिक ऐसिड व यूरिया के बढने पर किया जाता है जिसकी वजह से गठिया के रोग या गठिया का र्दद होता है । अत: इसका प्रयोग र्दद निवारक अन्य दवाओं के साथ गठिया रोगों में कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । यदि शरीर से पसीना न आ रहा हो तो इसको देने से पसीना आने लगता है एंव पसीने के रूक जाने से जो भी रोग होते है उसमें लाभ होता है । तथा इसका प्रयोग शरीर में मॉस व हड्डीयों के बढने पर किया जाता है । यह दवा मूत्रल व कब्ज नाशक भी है एंव किसी भी प्रकार के कीटाणुओं को मार देती है, या शरीर से बाहर कर देती है । अत: यह कीटाणु नाशक भी है । अस्थियों में र्दद, सूजन, गलना ,दॉतों के रोग, यह दवा एन्टीसेप्टीक एंव एन्टी वायरल भी है ।
मधुमेह:- इस दवा का प्रयोग मधुमेह की बीमारीयों में अन्य सहायक औषधियों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ।
8-वर्मिफ्युगोज :–‘ इस वर्ग में में वर्मिफ्युगोज दवा का रखा गया जो संख्या में 2 है इस ग्रुप की दवा का प्रभाव विशेष रूप से ऑतों पर है एंव यह शरीर से किटाणुओं व कृमियों को शरीर से खत्म कर देती है
वर्मीफयूगोज -1 के निर्माण में जिन वनस्पतियों का प्रयोग किया गया है , उनमें अधिकतर ऐसी औषधीयॉ है, जिनका प्रभाव पेट में होने वालें कीडों व संक्रामण रोग जो बैक्टेरिया आदि के कारण उत्पन्न होते है । बैक्टेरियल बीमारीयों के साथ इसमें प्रयुक्त होने वाली कुछ औषधीयों का प्रभाव आंतों के म्युकस मैम्बरेन पर होता है इससे आंतों के ग्लैण्ड, आंतों में रसों का स्त्रावों को बढा देते है इससे ऑतों व मल द्वार में जमें हुऐ व्यर्थ पदार्थ शरीर से बाहर निकल जाते है । इसमें प्रयुक्त वनस्पतियों का विस्तार से अध्ययन किया जाये तो हम इस नतीजे पर पहुचते है इसमें पेट में होने वाले किसी भी प्रकार के कीडे चाहे वे सूत क्रिमी हो या थ्रेड या फीत वर्म , या केचुवे की तरह के बडे बडे वर्म हो सभी को यह दवा निकाल देती है । कुछ विद्वान चिकित्सकों का कहना है कि इसके प्रथम डायल्युशन से पेट के कीडे मृत अवस्था में निकल जाते है । वही कुछ गृन्थकारों ने लिखा है कि पेट के कीडों के लिये यह दवा एक ऐसा माहौल बना देती है जिससे वह उस स्थान को छोड देते है । पेट में कीडों को पनपने के लिये उनके उपयुक्त वातावरण चाहिये होता है, जैसे मल का रूका होना या सडाद वाला वातावरण या फिर कीडों के लिये उचित वातावरण आदि अत: इस दवा को देने से पेट के कीडे जिन्दा अवस्था में ही बाहर निकल जाते है । जैसाकि पहले ही लिखा है कि यह ऑतों के म्युकस मैम्बरेन से रस स्त्रावों ये रस स्त्राव ऑतों में जमे पदार्थो को मल द्वार तक ला कर मल निस्कासन में सहायता करते है इससे यदि इस दवा को प्रथम डायल्युशन या स्पेरेजिक रूप में देने से पेट में मरूर के साथ दस्त हो जाता है , इसलिये इसका उपयोग सावधानी से करना चाहिये वैसे दस्त होने पर कीडों के साथ ऑतों में जमा मल भी निकल जाता है यदि यह अवस्था निर्मित हो तो एस-10 व एस-3 देने से व इस दवा को बन्द कर देने से उपरोक्त समस्या का निदान हो जाता है । यह दवा पेट में कीडों के साथ संक्रामण बैक्टेरिया, वायरस आदि पर भी प्रभावित है अत: किसी भी प्रकार के वायरल संक्रामक बीमारीयों में वायरस व बैक्टेरिया से बचाने में यह सहायक है । बैक्टेरिया की वजह से किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह टी बी हो खॉसी , या अन्य प्रकार की बीमारी जो बैक्टेरिया या संक्रामण की वजह से हो उसमें इस दवा का प्रयोग अन्य सहायक औषधियों के साथ किया जा सकता है । हैजा उल्टी दस्त स्कीन की बीमारीयॉ खुजली , सूखी हो या गीली, ऑखों के संक्रामण में , बबासीर फिस्टूला या अन्य प्रकार के संक्रामित धावों के उपचार में भी इसका प्रयोग अन्य सहायक औषधीयों के किया जा सकता है । भूंख का कम लगना या अत्याधिक लगना , बच्चों के पेट में कीडे होने पर रात्री में चौक जाना , नाक खुजलाना ,सोते समय मुंह से लार गिरना, शरीर में दरोरे पडना यह बडे लोगों में भी हो सकता है । पेट में कीडे होने पर बच्चा कुछ भी खाये पिये दिनो दिन सूखता जाता है व उसे भूख बहुत लगती है मलद्वार में कीडों के कॉटने से खुजली होती है । यदि ब्रेन में पेट में कीडे हो तो इस दवा का प्रयोग किया जा सकता है ,या बुखार किसी इंफेक्शन या संक्रामण रोग की वजह से हो इसका प्रयोग अवश्य करे , यूटीआई की समस्याओं में भी इसका प्रयोग अन्य सहायक दवाओं के साथ किया जा सकता है । इस दवा का प्रयोग श्वसन तंत्र के संक्रामण जिसमें खॉसी ,दमा, सूखी खॉसी, गीली खॉसी आदि में इसका प्रयोग पी ग्रुप की दवाओ के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । त्वचा रोगों में जिसमें एग्जीमा, सूखी खुजली , त्वचा में ददोरे, भी इसका प्रयोग एस-3 सी-3 दवाओं व एपीपी के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । कब्ज होने पर इसका प्रयोग एसलॉस , वाई ई , एस-2 गरम पानी के साथ करने पर एक दो दिन में उचित परिणाम मिलने लगता है । वर्मीफयूगोज -2
वर्मीफ्यूगोज-2 -- वर-1 से गहरा प्रभाव रखने वाली दवा है जब कभी वर-1 से परिणाम न मिले तब इसका आंतरिक व वाहय प्रयेाग कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । यह इलैक्ट्रो होम्योपैथिक की एन्टी बायोटिक दवा है । जिस प्रकार वर-1 कार्य करती है उसी प्रकार के रोगों में यह दवा कार्य करती है । परन्तु इसका प्रभाव गहरा होता है । यह दवा भी पेट में किसी भी प्रकार के कीडे हो उसे निकाल देती है । यह दवा सभी प्रकार के बैक्टेरियल बीमारी में भी उपयोगी है मुंह व गले में छाले धॉव या इंफेक्शन में इसका गरारा करने से लाभ होता है । बैक्टेरियल बीमारीयों में यदि त्वचा रोग , एग्जीमा, आर्टिकेरिया, त्वचा में खुजली या त्वचा रोग हो तो इसका उपयोग अन्य सहायक औषधियों के साथ कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है ,यह दवा कब्ज , सूखा मल व गुदाद्वार में खूजली आदि में एस लास, वाई ई के साथ प्रयोग कर उचित परिणाम प्राप्त किये जा सकते है । जैसाकि पहले ही बतलाया जा चुका है कि यह दवा एन्टी बैक्टेरियल है अत: संक्रामक रोग , व बुखार आदि एफ ग्रुप की दवाओं के साथ इसका प्रयेाग किया जा सकता है । उल्टी दस्त पेट में गैस बनना मलद्वार के रोग मूत्राश्य के रोग , जो बैक्टेरिया की वजह से हो इसका उपयोग किया जा सकता है । बालों के रोग बालों में फंगस होना यह दवा एण्टीसेप्टीक की तरह से भी कार्य कारती है । इसके साथ इसका उपयोग नीद न आना , आधा शीशी का र्दद , धॉव , फफोले पडना, बैक्टेरिया की वजह से धॉवों का सडना , । पेशाब के रोगों में इसका उपयोग सी-17 के साथ करने से अच्छे परिणाम मिलते है । वात पीडा , मॉसपेशियों में र्दद ,मिर्गी के दौरे , दिमाक में कीडे आदि की वजह से उत्पन्न रोगों में इसका प्रयोग किया जा सकता है । मॉसपेशियों के र्दद ,बैक्टेरियल फंगल, एंव धॉव आदि में इसका अंतरिक व वाहय प्रयेाग करते है । ऐनिमा आदि में भी इसका प्रयोग किया जा सकता है । बच्चों की खॉसी , दॉत निकलते समय दस्तों का लगना, पीरियड का रूक रूक कर होना ,बच्चों का जिद्द करना , चिडचिडापन, जिद्दी स्वाभाव के बच्चे हमेशा रोते रहना
10-इलैक्ट्रीसिटी:- इस वर्ग में पॉच
इलैक्ट्रीसिटी एंव एक तरल औषधिय अकुवा पैरिला पैली (ए0पी0पी) है । इसमें पॉच
इलैक्ट्रीसिटी एंव एक त्वचा जल सम्मलित है जो क्रमश: निम्नानुसार है ।
1-व्हाईट इलैक्ट्रीसिटी :-इसे सफेद बिजली भी कहते है , इसकी क्रिया ग्रेट सिम्पाईटिक नर्व, सोरल फ्लेक्स,लधु मस्तिष्क तथा वात संस्थान के समवेदिक सूत्रों पर है ,इसलिये यह वातज निर्बलता की विशेष औषधिय है ,इसका प्राकृतिक गुण पीडा नाशक,शक्ति प्रदान करने बाली , नींद लाने वाली वातज पीडा को ठीक करने वाली एंव ठंडक पहुचाने वाली है । इसका वाह्रय एंव आंतरिक प्रयोग किया जाता है ।
2- ब्लू इलैक्ट्रीसिटी
:-इसे
नीली बिजली भी कहते है ,यह रक्त प्रकृति के अनुकूल है ,इसका प्रभाव हिद्रय के
बांये भाग पर है यह रक्त के स्त्राव को चाहे वह वाह्रय स्थान या अंतरिक अवयव से
हो उसे रोक देती है ,नीली बिजली क्योकि यह रक्त नाडियों का सुकोड देती है इससे
रक्त स्त्राव रूक जाता है । यह लकवा ,मस्तिष्क में रक्त संचय ,चक्कर आना
,खूनी बबासीर , या शरीर से रक्त स्त्रावों के लिये उपयोगी है ।
3-रेड इलैक्ट्रीसिटी:- इसे लाल बिजली भी कहते है, यह कफ प्रकृति वालों के अनुकूल है इसकी प्रकृति पीडा नाशक,बल वर्धक उत्तेजक,प्रदाह नाशक, ग्रन्थी रोग नाशक है । इसमें रक्त की मन्द गति को तीब्र करने का विशेष गुण है ।
4-यलो इलैक्ट्रीसिटी:- इसे पीली बिजली भी कहते है,यह कफ प्रकृति वालों के अनुकूल है इसकी प्रकृति पीडा नाशक, रक्त की कमी एंव ऐढन को दूर करने वाली, कै को रोकने वाली एंव कृमि नाशक है तथा वात सूत्रों को बल प्रदान करने वाली है । यह औषधिय बल वर्धक है तथा अन्य अपनी सजातीय औषधियों के साथ प्रयोग करने पर शरीर से पसीना लाने वाली है । वात सूत्रों ,ऑतों,और मॉस पेशियों पर इसका विशेष प्रभाव है ,मिर्गी,हिस्टीरिया,जकडन,पागलपन इत्यादि में एंव उष्णता को शान्त करने के लिये इसका प्रयोग होता है ।
5-ग्रीन इलैक्ट्रीसिटी:-इसे हम हरी बिजली भी कह सकते है ,यह रक्त प्रकृति वालों के लिये अनुकूल है इसका प्रभाव शिराओं एंव उनकी कोशिकाओं और हिद्रय के आधे दाहिने भाग की बात नाडियों पर है , इसकी क्रिया त्वचा ,श्लैष्मिककला पर होता है, इसके प्रयोग से किसी भी प्रकार के धॉव, चाहे वे सडनें गलने लगे हो उसमें इसका प्रयोग किया जाता है जैसे कैंसर, गैगरीन,दूषित धॉव बबासीर ,भगन्दर के ऊभारों में इसका प्रयोग किया जाता है । मस्सों,चिट्टे इसके प्रयोग से झड जाते है यह जननेन्द्रिय या मूंत्र मार्ग से पीव निकलने पर अत्यन्त उपयोगी है । इसके प्रयोग से शरीर के अन्दर या बाहर किसी भी स्थान पर कैंसर हो जाये तो उसकी पीडा को यह दूर कर देती है ।
6-अकुआ पर ला पेली या ए0पी0पी :- इसका प्रयोग त्वचा को स्निग्ध, मुलायम, चिकनाई युक्त एंव सुन्दर स्वस्थ्य बनाने तथा त्वचा के रंग को साफ करने के लिये वाह्रय रूप से (त्वचा पर लगाना) उपयोग किया जाता है । इस दवा को ऑखों के चारों तरफ की त्वचा पर (ऑखों पर नही) लगाने से ऑखों को शक्ति मिलती है । इसका प्रयोग चहरे व त्वचा को चिकना मुलायम साफ चमकदार बनाने में तथा दॉग धब्बे झुरियों अथवा मुंहासे,चहरे के ब्लैक हैड, खुजली ,छीजन,त्वचा के रंग में परिवर्तन आदि में किया जाता है ।
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